सुमित्रा ताई ने किया सत्य को स्वीकार
April 6, 2019 • राकेश रमण
सैद्धांतिक व आध्यात्मिक नजरिये से देखा जाए तो जब यह संसार ही स्थाई तौर पर हमेशा रहनेवाला नहीं है तो फिर सांसारिक लोग, चीजें व बातें कैसे स्थाई रह सकती हैं। लिहाजा हर निर्माण के साथ ही उसके विनाश की उल्टी गिनती भी आरंभ हो जाती है। जो आज है वह कल नहीं था और आगे भी हमेशा नहीं रहेगा। यही इस संसार का निर्विवाद सत्य है जिसे सहजता से स्वीकार करने वाले को किसी भी स्थिति में कोई दुख, तकलीफ या कष्ट नहीं होता। लेकिन जो समय के साथ विघटन व ह्रास को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता और मनमुताबिक स्थिति को हमेशा के लिये बरकरार रखने की चेष्टा में लगा रहता है उसे हर बदलाव के साथ दुख के एहसास को भुगतना ही होता है। यह सत्य सभी वर्ग, क्षेत्र व आयाम पर एक समान तरीके से लागू होता ही है। लिहाजा सियासत इससे कैसे अछूती रह सकती है। राजनीति में भी सूर्योदय और सूर्यास्त का सिलसिला लगातार चलता ही रहता है। रंगमंच पर नए चेहरे उभरते हैं, चमकते हैं और एक वक्त के बाद विलुप्त हो जाते हैं। यानि सहज व सरल शब्दों में कहें तो आने वाले का जाना, चमकने वाले का विलुप्त होना और उदित होने वाले का अस्त होना तय ही है। ऐसे में दो ही विकल्प होते हैं। या तो अपना खेल दिखाने के बाद खुद रंगमंच से हट जाने की पहल की जाए अन्यथा समय तो मंच से हटा ही देगा। लेकिन समय हटाएगा तो उसमें संवेदना की उम्मीद नहीं रहेगी। वह किस तरह से हटाएगा यह किसी को नहीं पता। ऐसे में बेहतर विकल्प यही है कि अपनी भूमिका निभाने के बाद खुद ही प्रतिष्ठापूर्वक हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए भावी कलाकारों के लिये रंगमंच को खाली कर दिया जाए। ठीक उसी प्रकार जिस तरह से लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने राजनीतिक रंगमंच को खाली कर देने की पहल की है। मिनी मुंबई कहलाने वाले मध्य प्रदेश के इंदौर से लगातार आठ बार से सांसद चुनी जाती रही लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने इस बार बकायदा सार्वजनिक तौर पर पत्र लिखकर लोकसभा चुनाव लड़ने से साफ इनकार कर दिया है। दरअसल उनको लोकसभा के टिकट से वंचित करना पार्टी के लिये व्यावहारिक तौर पर बेहद कठिन हो गया था जबकि 75 साल से अधिक की उम वाले नेताओं को सक्रिय राजनीति की जिम्मेवारियों से मुक्त करने के सिद्धांत का अनुपालन करना भी आवश्यक था। ऐसे में पार्टी के लिये कोई भी फैसला लेना बेहद कठिन हो गया था। वास्तव में सुमित्रा ताई जिस कद और कलेवर की नेत्री हैं उनके बारे में यह फैसला करना पार्टी के मौजूदा निजाम के लिये निश्चित ही बेहद कठिन था कि अब उनको सक्रिय राजनीति से अलग कर दिया जाए। क्योंकि जितने भी भाजपाई रणनीतिकार हैं उन सबसे वे वरिष्ठ भी हैं, हर मामले में अनुभवी भी, जनप्रिय भी और सफल भी। उस पर उनकी सौम्यता और ममत्व के सभी कायल हैं। हालांकि सुमित्रा ताई की सहजता और सरलता के कारण उनकी विराट उपलब्ध्यिों पर आम तौर पर लोगों का ध्यान नहीं जा पाता है। लेकिन सच तो यह है कि पार्टी को असमंजस से उबारने के लिये लोकसभा का टिकट पाने की रेस से खुद को बाहर करनेवाली सुमित्रा ताई की बात करें तो उनके नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं। मसलन वे दूसरी महिला राजनेता हैं जिन्हें लोकसभा अध्यक्षा बनने का मौका मिला। इसके अलावा वे इंदौर से लगातार वर्ष 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 के बाद 2014 में आठवीं बार सांसद बनीं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सुमित्रा महाजन 2002 से 2004 तक केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में शामिल थीं। उन्हें मानव संसाधन, संचार तथा पेट्रोलियम मंत्रालय का काम दिया गया था। वो प्रथम महिला हैं जो कभी लोकसभा चुनावों में पराजित नहीं हुई और लगातार आठ बार सांसद चुनी गईं। ऐसी विराट शख्सियत के बारे में कोई कठोर फैसला ले पाना पार्टी नेतृत्व के लिये वाकई सरल नहीं हो सकता है। वह भी तब जबकि वे खुद भी एक बार और चुनाव लड़ने की इच्छा जता रही हों। सुमित्रा के पत्र से स्पष्ट है कि उन्होंने इंदौर से चुनाव लड़ने को लेकर पार्टी के सभी वरिष्ठ नेताओं से बात कर चुकी थीं। यानि सुमित्रा ने दावेदारी तो ठोंक ही दी थी। लेकिन पार्टी के सामने असमंजस की स्थिति यह थी कि जब 75 साल से अधिक की उम्र के लालकृष्ण आडवाणी, डाॅ. मुरली मानोहर जोशी और कलराज मिश्रा को इस बार लोकसभा का टिकट नहीं देकर उन्हें सक्रिय राजनीति से अलग किया जा रहा है तो सुमित्रा के लिये इस नियम में कैसे ढ़ील दी जाए। आखिर नियमों की भी मर्यादा रखनी तो आवश्यक ही है। लेकिन किसकी हिम्मत थी कि वह खुल कर यह कहने की जुर्रत करे कि इस बार सुमित्रा को टिकट से वंचित कर दिया जाए। यानि असमंजस और उहापोह भीषण हो गया था। ऐसे में सुमित्रा ने ही पार्टी के नेतृत्व को असमंजस से उबारना और अपने लिये खुद ही प्रतिष्ठापूर्ण विदाई का रास्ता चुनना श्रेयस्कर समझा। निश्चित ही इससे पार्टी की भी प्रतिष्ठा कायम रही, नीति की मर्यादा भी बरकरार रही और सुमित्रा के प्रति सम्मान में भी इजाफा हुआ है। मीडिया को जारी किये गये पत्र के माध्यम से लोकसभा चुनाव के लिये इंदौर से टिकट पाने की दौड़ से खुद को अलग करने का ऐलान करते हुए लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने अपने पत्र में लिखा है कि- ‘‘हो सकता है कि पार्टी को निर्णय लेने में कुछ संकोच हो। मैंने इस बारे में बहुत पहले ही पार्टी के वरिष्ठों से चर्चा कर उन्हीं पर निर्णय छोड़ दिया था। लगता है कि अभी उन लोगों के मन में कुछ असमंजस है। इसलिए मैं खुद ये घोषणा करती हूं कि मुझे अब लोकसभा का चुनाव लड़ना ही नहीं है। पार्टी अब अपना निर्णय खुलकर ले सकती है।’’ हालांकि सुमित्रा के इस पत्र को लेकर पार्टी की ओर से अभी औपचारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है लेकिन माना जा रहा है कि अब इंदौर से बेशक सुमित्रा के नाम पर विचार ना किया जाए लेकिन उनके उत्तराधिकारी का चयन उनकी मर्जी व पसंद के आधार पर ही किया जाएगा।