सड़क को सुरक्षित करना जरूरी
July 24, 2019 • राकेश रमण
भारत में सड़क के सफर को हमेशा से ही सबसे असुरक्षित व खतरनाक माना जाता रहा है। इसकी वजह भी यही है कि भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या और इसमें जान गंवानेवालों की तादाद दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन के अनुसार, दुनिया भर में वाहनों की कुल संख्या का महज तीन प्रतिशत हिस्सा भारत में है, लेकिन यहां होने वाले सड़क हादसों और इनमें जान गंवाने वालों के मामले में भारत की हिस्सेदारी 12.06 प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की प्रति वर्ष सड़क हादसों में मौत होती है। इसमें भारत की हिस्सेदारी साढ़े बारह फीसदी से भी कहीं ज्यादा है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर दिन लगभग 1,374 सड़क दुर्घटनाओं में 400 मौतें होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे यहां हर घंटे सड़क 57 दुर्घटनाओं में 17 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। इसमें भी सबसे चिंताजनक बात यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवानेवालों में तकरीबन 65 फीसदी तादाद 15 से 35 वर्ष की आयुवर्ग के लोगों की होती है। यानी बेलगाम होती सड़क दुर्घटनाओं का सीधा सरोकार समाज के सबसे उत्पादक वर्ग से जुड़ता है और इसका सबसे नकारात्मक प्रभाव समाज के उत्पादक मानव संसाधन पर ही पड़ता है। अगर सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में वृद्धि दर के आंकड़ों को देखें तो यह भी बेहद डरावनी तस्वीर दिखाती है क्योंकि सालाना औसतन पांच फीसदी की दर से ऐसे मामलों में वृद्धि हो रही है। लिहाजा यह बेहद आश्यक है कि इस स्थिति में सुधार लाया जाए और सड़कों को सुरक्षित सफर के लिहाज से बेहतरीन बनाया जाए। लेकिन मसला है कि भारत का मोटर व्हीकल एक्ट अंग्रेजों की सोच, अवधारणा और मानसिकता से अब तक बाहर नहीं निकल सका है। यह वहीं सोच है जिसमें किसी हिन्दुस्तानी के पास गाड़ी होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हिन्दुस्तानी तो सिर्फ अंग्रेजों की गाड़ी के नीचे दब कर मरने के लिये होता था। जिन हिन्दुस्तानियों के पास गाड़ियां होती भी थीं वे ताव-तेवर में अंग्रेजों से कतई कम नहीं होते थे और उनमें से अधिकांश की नजर में आम आदमी की हैसियत किसी कीड़े-मकोड़े के अधिक नहीं होती थी जिसकी अगर उनकी गाड़ी के नीचे दबकर मौत भी हो जाए तो इसमें गलती गाड़ी के मालिक या चालक की नहीं बल्कि मृतक की ही मानी जाती थी। आखिर वह आया ही क्यों गाड़ी के सामने? उसी मानसिकता और सोच के तहत बनाये गये मोटर व्हीकल एक्ट से आखिर उम्मीद भी क्या की जा सकती थी। तभी तो अब तक गाड़ी के नीचे दबकर मरनेवाले को किसी भी स्तर पर न्याय नहीं मिल पाता क्योंकि कानून तो आखिरकार अंग्रेजों द्वारा अमल में लायी जानेवाली अवधारणा पर ही आधारित है। तभी तो सड़क दुर्घटना में हत्या की वारदात को अंजाम देनेवालों को भी बमुश्किल ही उम्र कैद की सजा मिल पाती है। वह भी तब जबकि अदालत में यह साबित कर दिया जाये कि मामला दुर्घटना का नहीं बल्कि हत्या का है और चालक ने गाड़ी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। चालक अगर नशे में गाड़ी चलाए तो उसे सर्वाच्च न्यायालय भी भले ही बारूद से भरी आत्मघाती हमलावर की गाड़ी का नाम देता हो लेकिन कानून की कमजोरी का आलम है कि महज कुछ जुर्माने या मामूली सजा से ही मामले का निपटारा कर देने के अलावा अदालत के पास भी कोई विकल्प नहीं है। इसी नतीजा है कि दुनिया की महज तीन फीसदी गाड़ी से भारत में साढ़े बारह फीसदी दुर्घटनाएं अंजाम दी जा रही हैं। लेकिन आज लोकसभा ने जो मोटर वीइकल अमेंडमेंट बिल पारित किया है उसे अमल में लाए जाने के बाद गलतियों की सजा इतनी बड़ी होगी कि उसे अंजाम देने से पहले कोई भी आदमी सौ बार सोचेगा। गाड़ी चलाना अब तक भले ही मजाक की तरह लिया जाता रहा हो और सड़क पर गाड़ियां दौड़ाने से पहले नियम कायदों के बारे में जानना, सोचना या समझना भी जरूरी ना समझा जाता रहा हो अब ऐसी गलतियों के बदले में जब पांच से तीस गुना अधिक जुर्माना अदा करना पड़ेगा तक ना सिर्फ लोग खुद जागरूक होंगे बल्कि अपने आस-पास के लोगों को भी जागरूक करेंगे। नए प्रस्तावों के तहत यदि किसी नाबालिग के द्वारा ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन होता है तो उसके अभिभावक को जिम्मेदार माना जाएगा, नाबालिग पर जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट के तहत केस चलेगा और वाहन का रजिस्ट्रेशन भी रद्द हो सकता है। इसी प्रकार नशे में गाड़ी चलाने पर न्यूनतम जुर्माने को 2,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये तक कर दिया गया है। रैश ड्राइविंग पर फाइन भी 1,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 कर दिया गया है। बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने अब पांच सौ नहीं बल्कि 5,000 रुपये तक का फाइन देना होगा। बिना सीट बेल्ट पहने गाड़ी चलाने पर 100 रुपये की बजाय 1,000 रूपया का जुर्माना अदा करना होगा जबकि तय सीमा से अधिक स्पीड से गाड़ी चलाने पर 400 के बजाय अब 2,000 रुपया जुर्माना देना होगा। यहां तक कि मोबाइल पर बात करते हुए ड्राइविंग करने पर अब तक अधिकतम जुर्माना एक हजार का होता था जिसे बढ़ाकर 5,000 रुपया किया जा रहा है।  इसके अलावा नए कानून के तहत पहली बार आपातकालीन सेवा वाले वाहनों यानि एम्बुलेंस व फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को रास्ता नहीं देने वालों पर भी जुर्माने का प्रावधान किया गया है। नए नियम के तहत दोपहिया वाहनों में ओवरलोडिंग पर पहले के 100 रुपये के मुकाबले अब 30 गुना अधिक यानी 3 हजार रुपये फाइन देना होगा। भारत में सड़क का इस्तेमाल करने वालों को अनिवार्य बीमा कवर देने के लिये नए कानून में मोटर वाहन दुर्घटना फंड के गठन का प्रस्ताव भी किया गया है। इसके अलावा हिट ऐंड रन के मामले में मृतक के परिजनों को सरकार की ओर से सिर्फ 25 हजार नहीं बल्कि दो लाख रुपये की राहत सहायता राशि दी जाएगी। कुल मिलाकर सरकार ने सड़क को सुरक्षित करने के लिये ठोस कदम उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और अब यह उम्मीद की जा सकती है कि साल 2020 में सड़क दुर्घटनाओं में पचास फीसदी कमी लाने का जो संकल्प लिया गया है वह अवश्य ही सफल होगा।