हर तरफ से पड़ी लात तो समझ में आई बात
April 30, 2019 • राकेश रमण
भारत को लेकर पाकिस्तान की नीति में बीते 48 घंटों में काफी बदलाव देखा जा रहा है। उसकी सारी हेकड़ी हवा हो गई है और कल तक आतंकवाद के मसले पर खुद को पाक साफ बताने वाला पाकिस्तान अब भारत को भरोसा दिला रहा है कि आतंक के खिलाफ दिखावे की नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई कर रहा है। पाक ने ना सिर्फ यह माना है कि उसकी जमीन पर आतंकियों का बसेरा मौजूद है बल्कि उसने औपचारिक तौर पर यह जानकारी दी है कि आतंकियों को प्रतिबंधित भी किया जा रहा है और उनके खिलाफ कार्रवाई भी की जा रही है। यह बात अगर पाकिस्तान की सरकार ने कही होती तो इसे एक बार फिर से झांसा देने का प्रयास माना जा सकता था। लेकिन इस बार पाकिस्तान की उस सेना ने यह बातें कही हैं जिसके बारे में सर्वविदित है कि आतंक का पालन-पोषण और संरक्षण उसके द्वारा ही किया जाता रहा है। आज पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के डीजी मेजर जनरल आसिफ गफूर ने औपचारिक तौर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मीडिया के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि पाकिस्तान ने हिंसक चरमपंथी संगठनों और जिहादी संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है और अब उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। गफूर ने माना है कि आतंक के कारण पाक को काफी क्षति झेलनी पड़ी है और आतंकवाद को खत्म करने के लिए काफी कुछ करने की जरूरत है। गफूर के मुताबिक पाकिस्तान को आतंकवाद के कारण लाखों डॉलर गंवाने पड़े हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पूर्व की सरकारें आतंकवाद से निपटने में नाकाम रही हैं और उसकी वजह से पाकिस्तान को लाखों डॉलर का नुकसान हुआ है। गफूर ने बेलाग लहजे में स्वीकार किया है कि पिछली सरकारें मेहरबानी करने में व्यस्त रही हैं और हर सुरक्षा एजेंसी भी इसी में व्यस्त रही है। इस वजह से हम प्रतिबंधित संगठनों के खिलाफ उस रणनीति को बनाने में नाकाम रहे हैं, जो हम आज बना रहे हैं। यानि गफूर के पूरे बयान को समग्रता में समझने की कोशिश करें तो उससे कई बातें सामने आती हैं। मसलन पाकिस्तान में आतंकियों की मौजूदगी को पाक की सेना ने औपचारिक तौर पर स्वीकार कर लिया है। साथ ही यह भी माना है कि अब तक आतंक को पाक के हुक्मरानों और वहां की सुरक्षा एजेंसियों का संरक्षण व प्रोत्साहन मिलता रहा है। इसके अलावा यह बताने की कोशिश भी की गई है कि आतंकवाद की जड़ें पाक में इतनी गहरी हैं कि उसके कारण देश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। और अंतिम बात यह कि आतंक के मामले से सेना का कोई लेना-देना नहीं है। यानि यह बात एक बार फिर साफ हो गई है कि पाकिस्तान की नीतियां किसी एक स्तर पर तय नहीं होतीं बल्कि वहां सेना, सरकार और सुरक्षा व खुफिया एजेंसियां अपने मनमुताबिक काम करती हैं जिसमें किसी एक पर किसी दूसरे का कोई जोर नहीं चलता है। तभी तो आतंक के लिये पाक की सेना ने सरकार और अन्य संस्थानों को जवाबदेह बता कर अपना पल्ला झाड़ लिया है। जबकि यह सबको पता है कि आतंकवादियों को पाकिस्तान की सेना ही ट्रेनिंग भी देती है और सरहद पार कराके भारत में भी धकेलती है। लेकिन इस हकीकत को पाक की सेना ने स्वीकार नहीं किया है। खैर, जितना उसने स्वीकार किया है वह भी कम नहीं है और इसे आतंक के प्रति और भारत को लेकर पाकिस्तान की नीति में बड़े बदलाव के तौर पर ही देखा जाएगा क्योंकि अब तक आतंक के मसले पर नकारात्मक रूख अपनाने वाले पाक के प्रधानमंत्री ने भी माना है कि वहां आतंकी मौजूद हैं और अब वहां की सेना ने भी इस सच्चाई को स्वीकार किया है। साथ ही पहली बार बीमारी को स्वीकार करने के अलावा इसके समुचित इलाज के प्रति भी कटिबद्धता का प्रदर्शन किया जा रहा है। वैसे भी पाकिस्तान को बेहतर पता है कि जब तक आतंक के खिलाफ ठोस कार्रवाई करता हुआ दिखाई नहीं देगा तब तक भारत के साथ आपसी रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने की कोई संभावना नहीं बनेगी। लिहाजा अब विकल्पहीनता की अवस्था में आने के बाद वैसे भी पाकिस्तान के पास कोई चारा नहीं बचा है। लेकिन सवाल है कि आज तक इस तरह सकारात्मक दिशा में पहलकदमी करने से आनाकानी करने वाले पाकिस्तान को ऐसी सद्बुद्धि कैसे हुई कि वह आतंक के खिलाफ और भारत के प्रति इतना सजग व संवेदनशील हो गया। इसका जवाब तलाशने के लिये ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है बल्कि बीते एक सप्ताह के घटनाक्रमों पर ही सरसरी निगाह डाले तो यह पता चल जाएगा कि चारों तरफ से लात खाने के बाद ही पाकिस्तान को असली बात समझ में आई है। यह लात उसे चीन ने भी मारी है और रूस ने भी। हर किसी ने उसको यह जताने में कोई कोताही नहीं बरती है कि उसकी हैसियत खैरात पर पलनेवाले बेगैरत भिखारी से अधिक और कुछ भी नहीं है। तभी तो बीजिंग में आयोजित बेल्ट एंड रोड समिट में शिरकत करने के लिए चार दिवसीय दौरे पर चीन पहुंचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के स्वागत के लिए कोई बड़ा अधिकारी या नेता नहीं पहुंचा। उनका स्वागत बीजिंग की म्यूनिसिपल कमेटी की डिप्टी सेक्रेट्री जनरल ली लिफेंग ने किया। पाकिस्तानी पीएम और उनके साथ पाकिस्तान में चीनी राजदूत याओ जिंग और चीन में पाकिस्तानी राजदूत मसूद खालिद भी एयरपोर्ट पहुंचे। इस दौरान खुद इमरान खान भी यह देखकर सन्न रह गए कि उनका स्वागत करने के लिए चीन सरकार का न तो कोई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद था न ही सरकार का कोई प्रतिनिधि। इसके बाद बीते चार दिनों में चीन ने जिस तरह से पाकिस्तान को मदद जारी रखने के एवज में वहां के रेलवे मार्ग पर कब्जा जमाने का समझौता करने के लिये इमरान को विवश किया वह भी किसी संप्रभु राष्ट्र के लिये कम अपमानजनक नहीं था। बीजिंग में पाकिस्तान को अपनी असली औकात का पता तब चला जब बैठक में शिरकत करने के लिये आए 37 देशों के प्रतिनिधियों व राष्ट्राध्यक्षों में से किसी ने भी इमरान के साथ अलग से बैठक करने की जरूरत महसूस नहीं की। हालांकि पाकिस्तान ने रूस से लेकर तमाम देशों के साथ द्विपक्षीय बैठक करने की कोशिश अवश्य की लेकिन किसी मुल्क ने उसे घास डालना मुनासिब नहीं समझा। विश्व में ऐसी बेकद्री झेलने के बाद पाकिस्तान के लिये वाकई शर्म से डूब मरने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। बीजिंग में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री इमरान के बीच द्विपक्षीय बैठक को लेकर रूस को सहमत कर पाने में हासिल हुई नाकामी के बाद पाकिस्तान में भारी तूफान मच गया है और वहां इसे एक बड़े कूटनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान में इमरान सरकार की भारी फजीहत हो रही है। लिहाजा ऐसी बेकद्री झेलने के बाद अब पाकिस्तान के पास सुधरने की राह पर आगे बढ़ने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है।