हिंदी साहित्य के अनन्य उपासक थे मैथिलीशरण गुप्त
August 2, 2019 •     बाल मुकुन्द ओझा

(  बाल मुकुन्द ओझा)

हिंदी साहित्य के अनन्य उपासक मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक काल के सर्वाधिक प्रभावशाली और लोकप्रिय रचनाकार थे जिन्हें स्वयं महात्मा गाँधी ने राष्ट्र कवि की उपाधि दी थी। उनकी 40 मौलिक तथा 6 अनुदित पुस्तकें प्रकाशित हुई। गुप्तजी को साहित्य जगत में दद्दा नाम से सम्बोधित किया जाता था। मैथिलीशरण गुप्त को देश में खड़ी बोली कविता के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि होने का गौरव हासिल है। उनकी भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतंत्रता संग्राम को असरकारक और देशभक्ति की भावना भरने में कामयाब हुई थी। उनकी यही कृति उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम का घोषणापत्र बन गई थी। भारत भारती देश में इतनी लोकप्रिय हुई कि प्रभात फेरियों, राष्ट्रीय आंदोलनों, शिक्षा संस्थानों ,प्रातकालीन प्रार्थनाओं में भारत भारती के पद गांवों-नगरों में गाये जाने लगे। 
 मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त सन 1886 में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ। विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। इनकी शिक्षा घर पर ही हुई और वहीं इन्होंने संस्कृत, बंगला, मराठी ओर हिंदी सीखी। वे कबीर दास के भक्त थे। पं महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया। खड़ी बोली की कविताओं को लिखने और खड़ी बोली को उपभाषा मानने वाले वे पहले कवि थे। उन्होंने ये सब उस समय किया जिस समय ज्यादातर हिंदी कवि ब्रज भाषा का उपयोग उपभाषा के रूप में करते थे। उन्होंने खड़ी बोली को पहचान दी। 
 उन्होंने न केवल भारत के जन-मन में राष्ट्रीय चेतना का जागरण कर उसे स्वाधीनता आन्दोलन के लिए प्रेरित किया, बल्कि स्वयं भी आन्दोलन में सक्रिय भाग लेकर जेल गये। लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल, गणेश शंकर विद्यार्थी और मदनमोहन मालवीय उनके आदर्श रहे। गुप्तजी ने कविता के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन में जबरदस्त हुंकार भरी । 
उन्होंने कहा 
जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
राष्ट्रकवि गुप्त की ये पंक्तियां हर किसी के दिल में राष्ट्रप्रेम का ज्वार भरने के लिए काफी हैं। जब देश में आजादी का आंदोलन अपने उफान पर था तब गुप्तजी की कविताएं आजादी के मतवालों के दिलों में जोश और उत्साह भरतीं थी। बालक मैथिलीशरण में कविता और अंगरेजी शासन के विरोध के संस्कार पिता से आये थे और रामायण-प्रेम एवं संयम-मर्यादा का संस्कार तुलसी रामायण का नियमित पाठ करने वाली माँ काशी देवी से। इसीलिए गुप्तजी की बहुत-सी रचनाएँ रामायण और महाभारत पर आधारित हैं। 1954 में पद्म भूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्तजी के काव्य के प्रथम गुण हैं, जो पंचवटी से लेकर जयद्रथ वध, यशोधरा और साकेत तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। साकेत उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर है। अपने साहस, हिम्मत ताकत और संघर्ष के बल पर जीवन में यश सफलता अर्जित करने वाले वे एक सर्वप्रिय कवि थे। 
यशोधरा में प्रकाशित उनकी कविता की दो लाइने जीवन का सार व्यक्त करती है -
     अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी!
     आंचल में ही दूध और आंखों में पानी!
प्रारम्भ में मैथलीशरण गुप्त ने सरस्वती जैसी पत्रिकाओं में कविताएं लिखीं। इनकी पहली प्रमुख कृति “रंग में भंग” 1910 में प्रकाशित हुई थी। इनकी प्रमुख काव्यगत कृतियां हैं  रंग में भंग, भारत-भारती, जयद्रथ वध, विकट भट, प्लासी का युद्ध, गुरुकुल, किसान, पंचवटी, सिद्धराज, साकेत, यशोधरा, अर्जुन-विसर्जन, काबा और कर्बला, जय भारत, द्वापर, नहुष, वैतालिक, कुणाल। इनकी कृति भारत भरती सन् 1912 में प्रकाशित हुई थी, जो एक राष्ट्रवादी कविता है, जिसमें भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपराओं की महिमाओं का बखान किया गया है।
आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। 1952-1964 तक राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुये। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने सन् 1962 ई. में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये। 1954 में साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
  गुप्तजी ने 78 वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, 19 खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। भारत भारती के तीन खण्ड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। राज्यसभा के सदस्य के रूप में  दिल्ली में  उनके घर पर दद्दा दरबार लगा रहता था जिसमे राजधानी के साहित्य-प्रेमी नेताओं से लेकर विभिन्न विधाओं में लिखने वाले साहित्यकारों का जमघट लगा रहता था। 12 दिसंबर,1964 को हिंदी साहित्य ने अपने सबसे महान लेखक खो दिया। गुप्त जी वास्तव में महान रचनाकार थे। वे आज हमारे मध्य में नहीं है पर उनकी बेमिसाल रचनांए हमारे दिलों में अमिट और अमर रहेगी ।