हिन्दुत्व पर कांग्रेस-भाजपा में चुनावी जंग
April 1, 2019 • Rakesh Raman
(विष्णुगुप्त)
दो चुनावी राजनीतिक घटनाओं ने केन्द्रीय चुनावी वातावरण को उथल-पुथल कर दिया। पहली चुनावी राजनीतिक घटना नरेन्द्र मोदी द्वारा हिन्दुत्व के प्रश्न पर कांग्रेस की घेराबंदी करना, कांग्रेस को हिन्दुओ के अपमान की दोषी के रूप में खडा करना और दूसरी चुनावी राजनीतिक घटना राहुल गांधी से जुडी हुई है। राहुल गांधी अमेठी के अलावा वायनाड से भी चुनाव लडेगे। वायनाड केरल के अंदर एक अल्पसंख्यक बहुलता वाली लोकसभा सीट है। राहुल गांधी ने अल्पसंख्यक बहुलतावादी लोकसभा सीट अपने लिए क्यों चुनी, इस पर सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि सीपीएम जैसी वामपंथी पार्टी भी नाराज है। भाजपा तो इसे मुस्लिम तुष्टीकरण की परिधि में लाने की पूरजोर कोशिश कर रही है। 
           केन्द्रीय चुनाव में ‘हिन्दुत्व ‘ कैसे चुनावी प्रश्न नहीं बनता? चुनावी प्रश्न तो बनना ही था, यह अलग बात है कि विलंब क्यों हुआ। इतनी देर से आखिर ‘हिन्दुत्व ‘ का प्रश्न कैसे सामने आया, इसके पीछे अर्थ और अनर्थ क्या है? आखिर नरेन्द्र मोदी को ‘हिन्दुत्व ‘ के प्रश्न को फिर से उठाने की जरूरत ही क्यों पडी, कांग्रेस के खिलाफ हिन्दुत्व के प्रश्न पर चुनावी आग लगाने की जरूरत क्यों पडी? क्या यह माना जाना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा को इस केन्द्रीय चुनाव में अनहोनी का डर सता रहा है, जीत की सारी योजनाओं पर नरेन्द्र मोदी और भाजपा को विश्वास कायम नहीं रहा? 
          नरेन्द्र मोदी की केन्द्रीय सत्ता तो विकास के प्रश्न पर सक्रिय और गतिमान थी। पांच सालों तक नरेन्द्र मोदी विकास पर फोकस करते रहे हैं। अपने पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने विकास को ही अपना मूल मंत्र माना था, और उनका नारा ‘सबका साथ और सबका विकास था? जब नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुत्व के प्रश्न को उसी तरह से उफान पैदा करने का कार्य किया है जो वे गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर करते थे और 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान करते थे तब यह स्वीकार कर लिया जाना चाहिए कि भाजपा और नरेन्द्र मोदी फिर भी हिन्दुत्व की चुनावी राजनीतिक शक्ति से मुक्त होना खतरे की घंटी समझते हैं। 
        राममंदिर आंदोलन के बाद देश की राजनीति में हिन्दुत्व का उभार और उफान उत्पन्न हुआ। 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद देश की चुनावी राजनीति में हिन्दुत्व एक प्रमुख प्रश्न बन कर खडा हो गया। इसी के साथ ही साथ भाजपा की सत्ता हासिल करने की सबसे आसान राजनीतिक प्रक्रिया भी बन गया। इसलिए नरेन्द्र मोदी ने जो हिन्दुत्व का प्रश्न खडा किया है, हिन्दुत्व को लेकर कांग्रेस की जो उन्होंने घेराबंदी की है वह अपेक्षित ही था। अभी भी हिन्दुत्व के प्रश्न में इतनी शक्ति है कि वह सत्ता का खेल बिगाड सकती है, भाजपा और नरेन्द्र मोदी की सत्ता किस्मत चमका सकती है और कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं को कमजोर और शक्तिहीन कर सकती है।
मोदी की इस चुनावी महातीर से कांग्रेस कितनी हलकान होगी, यह भी एक प्रश्न है। कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी के आरोपों को खारिज कर दिया है। कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष कुमार ने कहा कि उनकी पिछली सरकार ने कभी भी हिन्दुत्व को न तो अपमानित करने का काम किया है और न ही हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी गढी थी। कांग्रेस के इस अस्वीकार को कैसे स्वीकार किया जा सकता है। तथ्य तो कांग्रेस के अस्वीकार को स्वीकार नहीं करते थे। तथ्य क्या है, तथ्य कांग्रेस के खिलाफ कितने पुख्ता है, तथ्य कितने चाकचैबंद हैं, तथ्य कितने नुकसानकुन वाले हैं? तथ्य तो यही है कि कांग्रेस ने हिन्दू आतंकवाद शब्द अविष्कार किया था। मनमोहन सिंह की पिछली दस साल की सरकार में हिन्दू आतंकवाद पर जबरदस्त फोकस था, कांग्रेस को यह खुशफहमी थी कि हिन्दू आतंकवाद का प्रश्न खडा कर केन्द्रीय सत्ता का स्थायीकरण संभव है, इस प्रश्न की राजनीतिक शक्ति से वर्षो-वर्षों तक केन्द्रीय सत्ता में बैठा जा सकता है और हिन्दुत्व को लेकर सत्ता हासिल करने वाली भाजपा को केन्द्रीय सत्ता से दूर किया जा सकता है। कांग्रेस ने यह भी नहीं सोचा-समझा कि इस प्रश्न का कोई नकारात्मक या फिर आत्मघाती प्रभाव भी उत्पन्न होगा?
             स्थितियां यह थी कि हिन्दुत्व के खिलाफ आग उगलने वाले नेता कांग्रेस के अंदर में बडे नेता माने जाते थे, हिन्दुत्व के खिलाफ आग उगलने वाले कांग्रेसी नेताओं को मीडिया और कांग्रेस की राजनीति में बडी जगह मिलती थी। जब मीडिया में और कांग्रेस के अंदर में बडी जगह मिलने की गारंटी होगी तो फिर हिन्दुत्व के खिलाफ आग उगलने की राजनीतिक प्रक्रिया कैसे नहीं उफान लेगी। कांग्रेस के अंदर कोई एक नेता नहीं बल्कि दर्जनों ऐसे नेता थे जो अपने बयानबाजी में हिन्दुत्व का अपमान करते थे और हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने में दिन राज परिश्रम करते रहते थे। ऐसे कांग्रेसी नेताओ में सबसे पहला नाम पी चिदम्बरम का था , सबसे पहले उन्होंने ही हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था। उस समय पी चिदम्बरम गृहमंत्री थे। उसके बाद उस समय के गृह मंत्री सुशील शिंदे ने जयपुर में हुई कांग्रेस की कार्यकारिणी बैठक में सरेआम हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि सुशील शिंदे ने कहा था कि हिन्दू आतंकवाद से देश को खतरा है, हिन्दू आतंकवाद को जमींदोज किया जायेगा। दिग्विजय सिह तो बार-बार हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करते थे और हिन्दुओं के खिलाफ आग उगलने वाले मुस्लिम नेताओं का पीठ थपथपाते थे। दिग्विजय सिंह ने तो बटला हाउस एनकांउटर को भी फर्जी बता दिया था और कहा था कि हिन्दुओं को खुश करने के लिए मुसलमानों का उत्पीडन जारी है। कपिल सिब्बल, मनीष कुमार, मनिशंकर अय्यर जैसे कांग्रेसी नेता हिन्दुओं को अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोडते थे।
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने राहुल गांधी की छवि को धूमिल करने और राहुल गांधी को हिन्दुओं के खिलाफ करने के लिए रणनीति को अंजाम देने का कार्य किये थे। राहुल गांधी को यह समझा दिया गया था कि हिन्दुओं के खिलाफ जितना आग उगला जायेगा उतना ही कांग्रेस को लाभ होगा, कांग्रेस को उतनी ही राजनीतिक शक्ति मिलेगी। उस समय तक राहुल गांधी की अपनी स्वतंत्र सोच या फिर कांग्रेस की रणनीति में स्वतंत्र राजनीतिक प्रक्रिया चाकचैबंद नही थी। राहुल गाध्ंाी अपने रणनीतिकारों और कांग्रेस के हिन्दू विरोधी नेताओं की सोच और परिधि में कैद रहते थे। ऐसी कांग्रेसी राजनीति परिधि में राहुल गांधी पर हिन्दुत्व को लेकर नकरात्मक मानसिकताएं कैसे नहीं उत्पन्न होती? स्वाभाविक तौर पर राहुल गांधी के अंदर हिन्दुत्व को लेकर नकारात्मक सोच-समझ विकसित हो गयी। इसका दुष्परिणाम यह हो गया कि राहुल गांधी भी हिन्दुत्व विरोधी कांग्रेसी टीम के हिस्सा हो गये। राहुल गांधी ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञ से कह डाला कि भारत को मुस्लिम आतंकवाद से नहीं बल्कि हिन्दू आतंकवाद से खतरा है, भारत को हिन्दुओं से खतरा है। अमेरिकी कूटनीतिज्ञ ने अपनी पुस्तक में राहुल गांधी के हिन्दू विरोधी सोच का पर्दाफाश किया है। सबसे बडी बात यह है कि कांग्रेस की अपनी रिपोर्ट ही इस प्रश्न की सच्चाई को प्रमाणित करती है। 2014 में कांग्रेस ने अपनी हार पर एक कमेटी बनायी थी। उस कमेटी के मुखिया ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि हिन्दू विरोधी छवि के कारण कांग्रेस की पराजय हुई है और कांग्रेस के बयानबाज नेताओं ने कांग्रेस से हिन्दुओं को दूर कर दिया था, कांग्रेस की छवि एक मुस्लिम परस्त पार्टी की बनी थी। 
             अगर कांग्रेस यह नकारती है, कांग्रेस यह कहती है कि उसने हिन्दू आतंकवाद शब्द नहीं गढे थे और न ही हिन्दुत्व को अपमानित की थी तो फिर कांग्रेस को कुछ प्रश्नों का जवाब देना ही होगा? पहला प्रश्न यह है कि फिर कांग्रेस की अपनी रिपोर्ट में ही हिन्दू आतंकवाद शब्द के आत्मघाती राजनीति प्रक्रिया की बात कैसे सामने आयी, अगर कांग्रेस की अपनी ही रिपोर्ट चाकचैबंद नहीं थी तो फिर अपनी एंथेनी रिपोर्ट को अब तक अस्वीकार क्यों नहीं किया गया? राहुल गांधी ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञ से देश को हिन्दुओं से खतरा की बात क्यों रखी थी? गृहमंत्री के तौर पर पी चिदम्बरम और सुशील शिंदे ने संसद में हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग क्यों किये थे? साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का उत्पीडन क्यों हुआ था, समझौता एक्सप्रेस में हिन्दू नेताओं के अपराध क्यों नहीं साबित हुए? राहुल गाध्ंाी अपने आप को शिव का भक्त और जनेउधारी हिन्दू क्यों कहते हैं। राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी मंदिर-मंदिर क्यों घूम रहे हैं, भगवा और पीला, उजला टीका क्यों लगा रहे हैं? अगर कांग्रेस ने हिन्दुओं से माफी मांग ली होती तो फिर कांग्रेस को फायदा ही होता।
             निश्चित तौर पर हिन्दुत्व में अभी चुनावी शक्ति बची हुई है। हिन्दुत्व एक बडा प्रश्न है। पर नरेन्द्र मोदी भी तो हिन्दुत्व के प्रश्न पर ईमानदार नहीं रहे हैं।