हेराफेरी, चोरी और सीनाजोरी
March 9, 2019 • राकेश रमण
यह बात सही है कि सभ्य समाज में हिंसा या तनाव के लिये कोई जगह नहीं हो सकती। साथ ही सभ्यता का तकाजा भी यही कहता है कि किसी भी मसले को शांतिपूर्ण ढ़ंग से आपसी बातचीत के सहारे सुलझाया जाना चाहिये। लेकिन सवाल है कि सभ्यता की बातें उसके साथ ही की जा सकती है जो उसकी अहमियत समझे। ऐसा तो नहीं हो सकता कि एक पक्ष अहिंसा के मार्ग पर डटा रहे और दूसरा पक्ष हिंसा के अलावा कोई दूसरी भाषा ही ना समझे। ऐसे में तो अहिंसामार्गी को भी कभी ना कभी ‘शठे शठ्यम समाचरेत’ की राह पर कदम आगे बढ़ाने के लिये मजबूर होना ही पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसा कि इन दिनों भारत को पाकिस्तान के साथ व्यवहार करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। भारत ने किसी शौक, जोश या जुनून में पाकिस्तान में पल रहे आतंकियों के खिलाफ पहले सर्जिकल स्ट्राइक और उसके बाद एयर स्ट्राइक नहीं की है। बल्कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने तो पूरी जिम्मेवारी के साथ दावा किया है कि पाकिस्तान की सरहद के भीतर जाकर आतंकियों के खिलाफ भारत की सेना ने तीन बार जोरदार प्रहार किया है जिसमें से दो बार का मामला सार्वजनिक हो चुका है जबकि तीसरे के बारे में विस्तार से बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। निश्चित ही भारत को बीते सत्तर सालों में पहली बार इस तरह की आक्रामक नीति पर अमल करना पड़ा है तो इसके पीछे असली वजह पाकिस्तान का दोहरा रवैया ही है। वह जिम्मेवार राष्ट्र की तरह अगर बातचीत से किसी भी मसले को हल करना चाहता तो कोई कारण नहीं है कि अब तक दोनों मुल्कों के बीच विवाद का कोई मसला बचता ही नहीं। लेकिन उसने एक तरफ शांति का राग आलापा, दूसरी ओर सरहद पर युद्ध जैसी स्थिति बनाए रखी और इस सबके अलावा भारत के खिलाफ आतंक को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में पाकिस्तान की ओर से खोले गए इन तीन मोर्चो पर एक साथ जवाब देते रहने का कोई मतलब ही नहीं था। पाकिस्तान ने किस कदर आतंकवाद को भारत के खिलाफ रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया इसकी स्वीकारोक्ति इसी सप्ताह कारगिल युद्ध के मुख्य साजिशकर्ता कहे जाने वाले पाक के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने की है। उन्होंने साफ शब्दों में स्वीकार किया है कि आईएसआई ने भारत में अशांति का माहौल बनाने के लिये जैश, हिजबुल व लश्कर सरीखे आतंकी संगठनों का लगातार इस्तेमाल किया है। इसके अलावा संसद हमले से लेकर मुंबई पर हुए आतंकी हमले और पठानकोट से लेकर पुलवामा तक में अंजाम दिये गए वारदातों में जिस तरह से पाकिस्तान की संलिप्तता के पक्के सबूतों को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मिल चुकी है उसके बाद अलग से इस मसले पर पाक को बेनकाब करने की कोई जरूरत ही नहीं बचती है। आखिर जिसके पूरे कपड़े उतर चुके हों उसे और कितना नंगा किया जा सकता है। लिहाजा भारत के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है कि अब पाकिस्तान की जमीन पर पल रहे आतंक के अड्डों को खुद ही नेस्तोनाबूत करे और अपने गुनहगारों को आगे बढ़कर सजा दे। अब इसे पाकिस्तान अगर अपने ऊपर हमले की नजर से देखता है तो यह उसकी परेशानी है। वर्ना अगर पाकिस्तान ने खुद ही आतंक के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कर ली होती और दोहरी नीति से बाज आ गया होता तो भारत को उसकी सरहद में घुसकर बल प्रयोग करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। लेकिन पाक को शायद यह लग रहा है कि वह दिखावे के लिये आतंकवाद पर कार्रवाई करके दुनियां की नजरों में धूल झोंकने में कामयाब हो जाएगा और भारत को पहले की ही तरह पर्दे के पीछे से परेशान करता रहेगा तो यह उसकी भूल ही है। सच तो यह है कि तीन आतंकी हमलों के जवाब में तीन सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर भारत की मोदी सरकार ने भविष्य के लिये ऐसी लकीर खींच दी है कि अब यहां सरकार भले ही किसी भी दल की क्यों ना बने लेकिन पाक पोषित आतंकवाद को लेकर नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। लिहाजा पाकिस्तान को ही यह तय करना है कि आखिर उसे किस रास्ते पर किस हद तक बढ़ना है। लेकिन कहावत है कि चोर चोरी करना छोड़ भी दे तो हेराफेरी करना कभी नहीं छोड़ता। लेकिन पाक ने तो चोरी के साथ सीनाजोरी और हेराफेरी का सिलसिला बदस्तूर कायम रखा हुआ है। अगर ऐसा नहीं होता तो आपस के द्विपक्षीय तनाव को मध्यस्थता करके सुलझाने का उसने पहले अमेरिका से और अब रूस से निवेदन नहीं किया होता। निश्चित ही यह पाकिस्तान की कूटनीतिक हेराफेरी का ही नतीजा है कि पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने बताया कि वे दोनों देशों के संपर्क में हैं और समझौता कराने का प्रयास कर रहे हैं और अब रूस ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है और बातचीत के लिए जगह भी मुहैया करने का प्रस्ताव किया है। लेकिन सवाल है कि मसला दो मुल्कों का आपसी है तो उसे सुलझाना भी तो इन दोनों को ही होगा। कोई तीसरा पक्ष इसमें आखिर क्या और क्यों मध्यस्थता करेगा। वह भी तब जबकि पाकिस्तान में तीन तरह की नीति एक साथ आगे बढ़ रही हो और तीनों में से कोई भी एक-दूसरे की बात मानने के लिये तैयार ना हो। भारत में तो सरकार के स्तर पर लिये गये फैसले को सेना भी मानती है सभी उसका सम्मान करते हैं। लेकिन पाकिस्तान की सरकार के साथ बातचीत करने से कोई हल तब तक नहीं निकल सकता जब तक वहां की सेना और आईएसआई के अलावा चरमपंथी जमातों के साथ भी अलग से सुलह ना किया जाए। ऐसे में औचित्य ही क्या है किसी बातचीत का। अगर वाकई पाकिस्तान की सरकार को बातचीत से मसला हल करना है तो पहले उसे अपनी सेना और आईएसआई पर नियंत्रण करना होगा जो पूरी तरह निरंकुश, अनुशासनहीन और स्वनियंत्रित है। उसके बाद आतंकियों का समूल नाश करना होगा। उसके बाद ही दो जिम्मेवार सरकारों के बीच आपसी बातचीत से सुलह सफाई और विश्वास बहाली की राह तैयार हो सकती है। वर्ना अभी तो आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की शुरूआत ही हुई है। इसके अंजाम तक पहुंचने के बाद पाकिस्तान के पास क्या और कितना बचेगा इसकी गारंटी तो उसके खुदा मियां भी नहीं दे सकते।