होली की कहानियां
March 18, 2019 • मंगल व्यास भारती

                                       (मंगल व्यास भारती)

देश में होली पर्व को अनेक कहानियों के साथ जोड़कर देखा जाता है। इनमें भक्त प्रह्लाद शिव और पार्वती और पूतना की कहानियां प्रमुख है। प्रत्येक कहानी के अंत में सत्य की विजय होती है और राक्षसी प्रवृत्तियों का अंत होता है। पहली कहानी शिव और पार्वती की है। पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये पर शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे। कामदेव पार्वती की सहायता को आये। उन्होंने प्रेम बाण चलाया और भगवान शिव की तपस्या भंग हो गयी। शिवजी को बडा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। फिर शिवजी ने पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिवजी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

उत्तर भारत के राज्यों में जिसमें राजस्थान भी शामिल है, भक्त प्रहलाद की कहानी विख्यात है। प्रहलाद भक्त की इस प्राचीन कहानी में बताया गया है कि हिरणकश्यप नाम का एक क्रूर और शक्तिशाली शासक था। वह स्वयं को न केवल भगवान मानता था अपितु दूसरों को भी प्रेरित करता था कि उसे भगवान के रूप में माना जाकर उसकी पूजा-अर्चना की जाये। उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था ओर भगवान के भक्तों पर तरह-तरह के अत्याचार करता था। हिरणकश्यप का पुत्र था प्रहलाद। प्रहलाद प्रभु की भक्ति में लीन रहता था जो उसके पिता को कभी सहन नहीं होता था। पिता की लाख कोशिशों के बावजूद प्रहलाद प्रभु भक्ति से विचलित नहीं हुआ। इस पर हिरणकश्यप ने उसे दण्डित करने का फैसला किया। हिरणकश्यप की बहिन होलिका को यह वरदान मिला था कि वह कभी आग में भस्म नहीं होगी। इसी का लाभ उठाते हुए हिरणकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को गोदी में बैठाकर जलती आग पर बैठ जाये ताकि होलिका बच जाये ओर प्रहलाद जलकर भस्म हो जाये। मगर हुआ इसका उल्टा। होलिका भस्म हो गई और प्रहलाद बच गया। कुछ लोग इस त्यौहार का सम्बन्ध भगवान कृष्ण से भी जोड़ते हैं। पूतना नामक एक राक्षसी एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर बालक कृष्ण के पास गयी। वह उनको अपना जहरीला दूध पिला कर मारना चाहती थी। दूध के साथ साथ बालक कृष्ण ने उसके प्राण भी ले लिये। कहते हैं मृत्यु के पश्चात पूतना का शरीर लुप्त हो गया इसलिये ग्वालों ने उसका पुतला बना कर जला डाला। मथुरा तब से होली का प्रमुख केन्द्र है। होली का पर्व राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी से भी जुडा हुआ है। वसंत के सुंदर मौसम में एक दूसरे पर रंग डालना उनकी लीला का एक अंग माना गया है। वृन्दावन की होली राधा और कृष्ण के इसी रंग में डूबी हुई होती है।
होलिका दहन को प्रतीक के रूप में आज भी समूचे देश में मनाया जाता है। होली का पर्व नजदीक आते ही एक सार्वजनिक स्थान पर होली का झण्डा गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी हो जाती है। होली का पहला दिन होलिका दहन और दूसरा दिन धुलण्डी के रूप में मनाया जाता है। धुलण्डी के दिन एक-दूसरे पर रंग गुलाल डालकर पूरी मस्ती से गाते-बजाते होली मनाते हैं और बाद में एक-दूसरे के गले मिलकर होली की बधाई देते-लेते हैं। इस दिन शत्रु भी अपना वैर भाव भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं।