आफत से भी राहत की उम्मीद
November 12, 2019 • राकेश रमण
चुनाव से ठीक पहले अगर सहयोगी दल साथ छोड़ दें और मैदान में उतरकर चुनौती देने लगें तो किसी भी पार्टी के लिये इससे बड़ी आफत की स्थिति और कुछ नहीं हो सकती। लेकिन राजनीति में कई बार राहत पाने के लिये ऐसी आफत की राहों से भी गुजरना पड़ता है। आफत की राहों से गुजरकर राहत की मंजिल पाने का ऐसा ही समीकरण भाजपा ने झारखंड में बिठाने की कोशिश की है। सीटों के बंटवारे को लेकर झारखंड में जारी भारी खींचतान और सहयोगी दलों की तमाम असहमतियों व असंतोष के बीच भाजपा ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी हालत में अपने हितों से समझौता नहीं करेगी। भाजपा ने सहयोगी दलों की ओर से अधिक सीटें मांगे जाने के दबाव को सिरे खारिज करते हुए कहा है कि सीट बंटवारे का फार्मूला पिछले विधानसभा चुनाव में ही तय हो गया था जिसमें किसी भी तरह के बदलाव की ना तो कोई गुंजाइश है और ना ही इसकी कोई जरूरत है। हालांकि भाजपा के इस अड़ियल रूख से नाराज होकर जहां एक ओर पिछले चुनाव में गठबंधन में शामिल रहकर एक सीट पर चुनाव लड़नेवाली लोकजनशक्ति पार्टी ने इस बार छह सीटों की दावेदारी खारिज हो जाने के बाद अपने दम पर प्रदेश की 50 सीटों पर चुनाव लड़ने ऐलान कर दिया है वहीं दूसरी ओर पिछली बार भाजपा के साथ मिलकर आठ सीटों पर चुनाव लड़नेवाली आजसू ने भी इस बार 19 सीटों की मांग नहीं माने जाने के नतीजे में अपने मनमुताबिक एकतरफा तरीके से प्रत्याशी खड़ा करना शुरू कर दिया है। हालांकि सहयोगियों के इस बगावती रवैये के बीच भाजपा ने अंदरूनी तौर पर उन्हें मनाने की कोशिशें अवश्य जारी रखी हुई हैं लेकिन राजग की एकजुटता सुनिश्चित करने के लिये समझौतावादी रूख अपनाने से पार्टी ने साफ इनकार कर दिया है। भाजपा की मानें तो लोजपा का झारखंड में कोई जनाधार ही नहीं है लिहाजा उसे गठबंधन में शामिल करने का कोई मतलब ही नहीं है। साथ ही आजसू को लेकर भी भाजपा का यही मानना है कि उसका प्रभाव प्रदेश के सीमित इलाकों में ही है लिहाजा उसके लिये नौ-दस सीटों से अधिक छोड़ना पूरी तरह बेतुका होगा। सतही तौर पर देखा जाये तो भाजपा के इस रवैये को अड़ियल और मनमाना बता देना बेहद आसान हो सकता है लेकिन गहराई से परखने पर पता चलता है कि सूबे की सियासत में सहयोगी दलों को अपना दुश्मन बना लेने की यह पूरी कवायद दरअसल एक सोची समझी रणनीति का ही हिस्सा है। दरअसल यह रणनीति है सत्ता विरोधी वोटों का बिखराव सुनिश्चित करने की। कायदे से देखा जाये तो झारखंड में भाजपा की सरकार को चुनौती देने के लिये झामुमो के नेतृत्व में कांग्रेस और राजद ने गठबंधन कर लिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि अगर राजग एकजुट होकर चुनाव लड़े तो आमने-सामने की लड़ाई में विरोधी वोटों का बिखराव नहीं होने के कारण भाजपा के लिये जीत की राह कठिन हो सकती है। हालांकि विपक्षी गठबंधन में बाबूलाल मरांडी की झाविमो को जगह नहीं मिल पाई है जिसके कारण सत्ता विरोधी वोटों में उनकी ओर से सेंध लगनी तय है। लेकिन वह दौर अलग था जब भाजपा में रहते हुए उन्होंने चमत्कारी चुनाव परिणाम दिये थे। उस जमाने को गुजरे अब जमाना हो चुका है और मौजूदा हालातों में उनका प्रभाव इतना अधिक नहीं है कि वे कोई बड़ी तीसरी ताकत बनकर उभर सकें। अगर उनकी पार्टी में वाकई कुछ कर दिखाने का सामथ्र्य होता या उनकी छवि से किसी करिश्मे की उम्मीद होती तो विपक्षी गठबंधन में उन्हें अवश्य शामिल किया जाता। लेकिन आज की तारीख में वे इस कदर अप्रासंगिक हो चुके हैं कि उनसे किसी चमत्कार की उम्मीद करना बेहद मुश्किल है। ऐसे में भाजपा के रणनीतिकारों को सत्ता विरोधी वोटों में बिखराव सुनिश्चित करने के लिये कोई ठोस रणनीति अपनानी ही थी। वह तो संयोग कहें अथवा पार्टी की किस्मत। परिस्थितियां ऐसी बन गई हैं कि भाजपा को महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होना पड़ा है और हरियाणा में नयी-नवेली बनी जेजेपी से भी नजरें झुकाकर बात करनी पड़ रही है। ऐसे में अन्य सहयोगी दलों को भी अपना दबाव बढ़ाने के लिये यह उचित समय महसूस हो रहा है। इसी के तहत लोजपा ने झारखंड में छह सीटों की मांग कर दी और आजसू तो 19 सीटों की सूची लेकर बैठ गया। हालांकि शुरूआत में यह पार्टी को बड़ी समस्या अवश्य महसूस हुई होगी। लेकिन बाद में गंभीरता से विचार करने के बाद उसे मौजूदा आफत में अपने लिये दूरगामी राहत की उम्मीद ही दिखी होगी। वैसे भी यह सहज सामान्य सी बात है कि अगर राजग में बिखराव हो जाता है और सभी सहयोगी अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरते हैं तो सत्ता विरोधी वोटों का कुछ हद तक बिखराव अवश्य होगा जिसमें प्रदेश की सत्ता पर दोबारा अपनी पकड़ मजबूत करना भाजपा के लिये काफी आसान हो सकता है। ऐसे में भाजपा ने ठीक ही किया है कि इस बार सहयोगियों की ओर से बनाए गए दबाव के समक्ष अधिक नहीं झुकना ही वह मुनासिब समझ रही है। वैसे भी पिछली बार लोजपा को गठबंधन में शामिल करके उसे शिकारीपुरा की जो इकलौती सीट दी गई थी वहां उसे हार का ही सामना करना पड़ा था जबकि आजसू के लिये जो आठ सीटें छोड़ी गई थीं उसमें से वह छह सीटों पर ही जीत दर्ज करने में कामयाब हो पाई थी। हालांकि राजग की एकजुटता प्रभावित होने से पार्टी को कुछ सीटों पर कड़े संघर्ष का सामना करने के लिये मजबूर होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन इस संभावना को भी सिरे से खारिज करना बेहद मुश्किल है कि प्रदेश की सभी 81 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ना भाजपा के लिये अंतिम तौर पर फायदे का सौदा भी साबित हो सकता है।