और कितने निर्भया का इंतजार कर रही हैं सरकारें ?
December 1, 2019 • देवानंद राय
( देवानंद राय)
जब समाज निष्क्रिय होने लगे,जब संवेदना सिर्फ फेसबुक तक सीमित होने लगी जब लोग एक दुर्घटना के बाद सचेत होने के बजाय दूसरे के होने का इंतजार करने लगे तब उस देश के कानून की परिस्थिति और वहां के महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति पर कुछ कहने के लिए बचता ही क्या है ? हाल ही में हैदराबाद में एक महिला चिकित्सक के साथ जिस प्रकार की निर्मम घटना हुई उसे कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर पाएगा पर उससे अधिक इस प्रकार की घटनाओं का राजनीतिकरण होना और उसमें हिंदू-मुस्लिम जैसा एंगल खोजना और खतरनाक स्थिति की ओर इशारा कर रहा है अब निर्भया जैसा आंदोलन सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गया है वह सड़क पर उतरने से पहले ही समाप्त हो जा रहा है या यूं कहें कि लोगों की संवेदनाएं अब सोशल मीडिया के बाहर दम तोड़ने लगी है महिला सुरक्षा की बात करें तो बातें तो बहुत हो रही है पर जब हर तरफ ललचाए आंखें, फब्तियां कसते जुबाने और हर नुक्कड़ चौराहे पर इंसान के शक्ल में हैवान खड़े हो तो उस देश की लड़कियों और महिलाओं को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग अब बचपन से ही देना जरूरी कर देना चाहिए जिस प्रकार से स्थिति बिगड़ती जा रही है हर रोज कहीं ना कहीं से छेड़छाड़ और बलात्कार की हजार खबरें आ रही हैं उससे तो ऐसा लगता है कि अब हर लड़की के हाथ बंदूक थमा देना चाहिए आने वाले 16 दिसंबर को ही निर्भया कांड की बरसी है पर देश का कोई व्यक्ति दिल पर हाथ रख कर यह बता सकता है कि वह इस घटना के बाद मिलने वाले न्याय से संतुष्ट है ? कोर्ट कचहरी का चक्कर काटते, हर किसी के सामने अपना दुखड़ा सुनाते कोर्ट में एक ही सवाल दस बार घुमा घुमा कर सुनते और उनके उत्तर देते जो मानसिक पीड़ा होती है उसका न्याय तो दुनिया के किसी कोर्ट में नहीं होता कोर्ट तो हर बार कहता है कि न्याय मिलने में देरी होना मतलब नैना मिलने के बराबर है पर वह खुद इसका पालन नहीं करता हालात तो यह है कि सात साल पहले हुए निर्भया कांड में निर्भया के मां-बाप अभी अंतिम न्याय के लिए कोर्ट का चक्कर काट रहे हैं यहां तक कि दुष्कर्म जैसे मामलों की सुनवाई के लिए बने फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है इन हालातों में जिस देश में लड़की को लक्ष्मी कहा जाता है जहां महिलाओं को देवी के समान माना जाता है और वहां कन्या पूजन की प्रथा हो वहां पर इस प्रकार की घटनाएं सोचने के लिए मजबूर करती हैं अब तो ऐसा लगता है कि इन कहावतों का चोला उतार कर महिलाओं को प्रचंड दुर्गा का रूप धारण कर लेना चाहिए जो लोग इस प्रकार की घटनाओं में धर्म विशेष एंगल देखते हैं उनकी निंदा होनी चाहिए इस प्रकार की घटनाओं में एक विशेष संप्रदाय के लोगों का पकड़ा जाना यह सोचने पर मजबूर करता है इनकी मानसिकता किधर जा रही है उनकी मानसिकता यह है कि उनके यहां बेटी भी बीवी होती है वो यही कबीलाई सोच के साथ आज भी जी रहे हैं इस पर विचार विमर्श का समय अब नहीं रहा इस पर सीधे कार्रवाई की आवश्यकता है सरकार ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर रोक लगाकर अच्छा कदम उठाया है तथा पोर्नोग्राफी पर भी काफी रोक लगाया है यह ठीक है पर टीवी चैनल और वेब सीरीज में कला की आजादी के नाम पता और अश्लीलता परोसी जा रही है उस पर सरकार चुप क्यों है ? अगर इसमें सरकार की गलती है तो उतनी ही गलती महिला संगठनों की भी है जो इस पर चुप्पी बनाए हैं पर किसी दूसरी घटना पर व्हाट्सएप डीपी बदलने से लेकर कैंडल मार्च निकालने के लिए हरदम तैयार रहते हैं यह व्हाट्सएप डीपी और कैंडल मार्च निकालने से अब कुछ ज्यादा असर पड़ता नहीं दिख रहा अब ऐसे लोगों को सीधा सबक सिखाने की जरूरत है पर मुझे उन लोगों पर संदेह है जो आज तो सीधा सबक सिखाने की बात कर रहे हैं पर कल वही लोग राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे कदमों को तालिबानी कदम बताने में नहीं हिचके चाहेंगे क्या हम संकल्प उस प्रतिज्ञा को भूल चुके हैं जो हमने और हमारी सरकारों ने प्रण लिया था कि अब कोई निर्भया नहीं होगी पर इस तरह की घटनाएं बंद नहीं हुई इससे तो ऐसा ही लगता है कि हम अपने वादों पर खरे नहीं उतरे और हम हर  साल इस प्रकार की घटनाएं पढ़ते और सुनते आ रहे हैं आज पूरा देश यही कहना चाहता है कि आखिर और कितने निर्भया ?