भाजपा की गलतियों पर गलतियां
November 26, 2019 • राकेश रमण
कहते हैं कि जीत के हजार दावेदार होते हैं लेकिन हार पूरी तरह अनाथ होती है। हार की जिम्मेवारी लेने के लिये कोई आगे नहीं आता। तभी तो जीत का सेहरा भले ही सेनानायक के सिर पर बांधने की परंपरा रही हो लेकिन हार की जिम्मेवारी अक्सर सामूहिक ही होती है। लेकिन होना तो यह चाहिये कि अगर ताली कप्तान को मिलती है तो गाली भी कप्तान को ही मिलनी चाहिये। इस लिहाज से देखें तो महाराष्ट्र की राजनीति में जिस बुरी तरह से भाजपा की रणनीतियां बुरी तरह विफल हुई हैं उसकी जिम्मेवारी लेने के लिये उसे आगे आना ही चाहिये जो हर बार जीत के श्रेय का सेहरा बांधने के लिये अपना सिर आगे कर देता है। खैर, यह तो भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को तय करना है कि सूबे की सियासत में चारों खाने चित्त होकर गिरने के लिये वे किसे जिम्मेवार समझते हैं। लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी ने सूबे में एक गलती नहीं की है बल्कि उसने गलतियों पर गलतियां करने की पूरी श्रृंखला का मुजाहिरा किया है। वर्ना कोई कारण नहीं है कि उसे तमाम जनआकांक्षाओं के बावजूद आज विपक्ष में बैठने के लिये मजबूर होना पड़ा है और जिस शिवसेना की उसके मुकाबले महज आधी सीटें आई हैं उसकी ताजपोशी पर ताली बजाने के लिये विवश होना पड़ रहा है। कायदे से तो भाजपा की ही सरकार बननी चाहिये थी और देवेन्द्र फडनवीस को ही मुख्यमंत्री बनना चाहिये था। इसी के पक्ष में सूबे की आम जनता ने मतदान भी किया और भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर जीत भी दिलाई। लेकिन वह भाजपा ही थी जिसने एक के बाद एक लगातार इतनी गलतियां की जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं है। मसलन सबसे पहली गलती तो शिवसेना के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करना ही था। वह भी तब जबकि शिवसेना के मुखपत्र में रोजाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर योगी आदित्यनाथ सरीखे दूसरी कतार के बड़े नेताओं के खिलाफ बेहद असभ्य लहजे में कटु बातें लिखी जाती हों। जो वर्ष 2014 में ही भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने के बाद दोबारा सरकार में साझेदारी हासिल करने के लिये पुरजोर सौदेबाजी को अंदाम देने की कोशिश कर चुकी हो। ऐसे में इतनी सावधानी तो रखनी ही चाहिये थी कि महाराष्ट्र में भाजपा अपने दम पर सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ती ताकि अधिकतम सीटों पर लड़कर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल करने की दिशा में पूरा प्रयास किया जा सके। बेशक चुनाव के बाद अगर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल करने में कुछ कमी बेसी भी हो जाती तो चुनाव के बाद गठजोड़ के बारे में विचार का विकल्प तो खुला ही रहता। लेकिन जब भाजपा ने अपने छोटे सहयोगी दलों के तकरीबन एक दर्जन से भी अधिक प्रत्याशियों को अपने चुनाव चिन्ह में समाहित करते हुए लड़ी ही सिर्फ 164 सीटों पर थी तो यह एक तरह से उसने पहले ही मान लिया था कि उसे बहुमत के लिये आवश्यक 145 सीटें नहीं मिलनेवाली हैं। खैर, उस गलती के बाद अगर गठबंधन धर्म का निर्वाह करते हुए पुरानी दोस्ती के नाम पर अपने बहुमत की संभावनाओं को कुर्बान कर ही दिया गया तो चुनाव के बाद शिवसेना को अपने साथ जोड़े रखने के लिये पूर्ण व गंभीर प्रयास किया जाना चाहिये था। लेकिन इस मामले में भी कहीं ना कहीं भाजपा की हेकड़ी ही दिखाई पड़ी जो शिवसेना को चुभनेवाली थी। अगर दोस्ती का दिखावा करने के लिये प्रधानमंत्री खुद ही चुनाव प्रचार के दौरान विरोधी दल के शीर्ष नेता शरद पवार को उनके जन्म दिन की बधाई देने के लिये उनके घर बारामती जा सकते हैं तो उस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को शिवसेना सुप्रीमो के निवास पर जाकर आगे की रणनीति बनाने के लिये बैठक करने में क्यों दिक्कत होने लगी। सच तो यह है कि चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा के किसी भी बड़े नेता ने मातोश्री जाकर उद्धव को अपनेपन का एहसास कराने की जरूरत महसूस नहीं की। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने भी सिर्फ दो बार उद्धव को फोन करके बधाई देने की औपचाकिता निभा कर अपनी ओर से गठबंधन धर्म का पूरा पालन कर लिया। पहली बार चुनाव परिणाम सामने आने के बाद और दूसरी बार दीपावली के दिन। इसके अलावा इधर से किसी ने भी सरकार बनाने की रूपरेखा तैयार करने के लिये मातोश्री जाकर उद्धव से मुलाकात करने की जहमत नहीं उठाई। साथ ही शिवसेना की ओर से समर्थन के बदले जो मांगे सामने रखी जा रही थीं उसका भी स्पष्ट शब्दों में कोई जवाब देना जरूरी नहीं समझा गया। कायदे से तो जब साथ मिलकर चुनाव लड़ा गया था तब आगे की रणनीति बनाने के लिये भी साथ में मिल बैठकर मतभेदों का हल तलाशने की गंभीर कोशिश की जाती। लेकिन ऐसा करने से परहेज बरत लेना भाजपा हेकड़ी में की गई गलती के नजरिये से ही देखा जाएगा। बाद में जब बहुमत के अभाव में सरकार बनाने से इनकार कर दिया गया तब कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की युति वाली महाशिव सरकार को आकार लेने से रोकने के लिये रातोंरात गुपचुप तरीके से चोरी-छिपे अजीत पवार को अपने साथ जोड़कर फडनवीस का शपथग्रहण करा देना भी निश्चित तौर पर गलत ही था। उसमें भी प्रधानमंत्री की ओर से बधाई का ट्वीट करा देना तो इतनी बड़ी गलती थी जिसने आज मोदी के कूटनीतिक कौशल को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। बेहतर होता कि शिवसेना की अगुवाई में सरकार बनने दी जाती और चुपचाप इंतजार किया जाता उस महामिलावटी व बेमेल गठबंधन के भीतर होने वाले उस अंतर्कलह का जिसकी भविष्यवाणी आज भी की जा रही है। लेकिन उस गलती से भी बड़ी गलती की गई है सदन का सामना करने के बजाय इस्तीफा देकर मैदान छोड़ने की। बेशक बहुमत का आंकड़ा भाजपा के हाथों से तभी फिसल गया जब अजीत पवार ने पद छोड़कर घरवापसी कर ली। लेकिन एक मौका तो था फड़नवीस के पास कि वे सदन में विश्वासमत के भाषण में अपनी बात रखते और लोगों को बताते कि किस तरह भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिये विरोधियों ने राजनीतिक साजिश रची है। उसके बाद अगर वे मतविभाजन कराने के बजाय पद छोड़ भी देते तो भाजपा को लोगों की ऐसी ही सहानुभूति मिलती जैसी अल्पमत की सरकार बनाने के बाद विश्वासमत की चर्चा के दौरान संसद में दिये गये अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण अथवा कर्नाटक विधानसभा में दिये गये बीएस येदियुरप्पा के भाषण से भाजपा को मिली थी। लेकिन गलतियों पर गलतियां करने का ही नतीजा है कि आज भाजपा को ना सत्ता मिली है और ना ही जनसंवेदना।