भारत रत्न पर भड़की सियासत
October 26, 2019 • राकेश रमण
महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में स्वातंत्र्यवीर सावरकर को भारत रत्न दिये जाने की सिफारिश करने का वायदा करके भाजपा ने जिस सकारात्मक सोच के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिवीरों को तत्कालीन राजनीतिक आंदोलनकारियों के समान बराबरी का सम्मान दिये जाने की दिशा में कदम बढ़ाया उसको लेकर शुरू हुआ राजनीतिक घमासान थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। एमआइएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने तो सावरकर को महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के साथ जोड़ते हुए यहां तक कह दिया कि सावरकर को भारत रत्न देने के बजाय बेहतर होगा कि सीधे ही गोडसे को यह सम्मान दे दिया जाए। इसी प्रकार सावरकर को लेकर तमाम तरह की बातें चर्चा में आने लगीं। बेशक कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने हिंदू विचारक सावरकर को भारत रत्न दिये जाने के प्रस्ताव पर कहा कि उनकी विचारधारा से सहमत या असहमत तो हुआ जा सकता है लेकिन इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, दलितों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और देश के लिए जेल गए। लेकिन ऐसे गिने-चुने बुद्धिजीवियों और संगठनों के अलावा अधिकांश गैरभाजपाई दलों की ओर से सावरकर को विलेन की तरह पेश करने में कोई कोताही नहीं बरती गई।
इसी कड़ी में अब पूर्व केन्द्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने आगामी 26 जनवरी को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को भारत रत्न दिये जाने की मांग कर दी है। निश्चित ही तिवारी की यह मांग जायज भी है और विचारणीय भी। लेकिन उनकी इस मांग के पीछे कहीं से भी इमानदारी नजर नहीं आ रही है। ना तो उनकी इस मांग में उनकी व्यक्तिगत इमानदारी झलक रही है और ना ही उनकी कांग्रेस पार्टी की इमानदारी दिख रही है। बल्कि यह मांग पूरी तरह राजनीति से प्रेरित दिखाई पड़ रहा है। अगर व्यक्तिगत स्तर पर तिवारी ने स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिवीरों को वह सम्मान दिलाने की इमानदारी दिखाई होती जो अब तक उन्हें नहीं दिया गया है तो उन्हें सबसे पहले सावरकार को भारत दिये जाने के भाजपा के वायदे का स्वागत और समर्थन करना चाहिये था। तिवारी को यह मालूम ही होगा कि सावरकर ही तमाम क्रांतिकारियों के प्रेरणाश्रोत भी थे और वैचारिक आदर्श व गुरू भी। ऐसे में अगर सावरकार को भारत रत्न दिया जाता है तो वह उस पूरी श्रृंखला का सम्मान होगा जिसकी कड़ी भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव से लेकर चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, बिस्मिल और सुभाषचंद्र बोस से भी सीधे तौर पर जुड़ती है। लेकिन सावरकर के नाम का समर्थन करने के बजाय जिस सतही सियासी लाभ के लिये तिवारी ने अन्य नामों को उछालकर मामले को उलझाने का प्रयास किया है वह निश्चित ही उनकी खुराफाती सोच व मानसिकता को दर्शाता है। दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से उठाए गए इस मांग को इस लिहाज से भी इमानदार नहीं कहा जा सकता है क्योंकि बीते सत्तर वर्षों के कालखंड में अधिकांश समय तक पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक में एकछत्र राज करनेवाली कांग्रेस की अगर स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहूति देनेवाले क्रांतिकारियों के प्रति जरा भी सहानुभूति होती तो उन्हें राजनीतिक तरीके से स्वतंत्रता संग्राम को संचालित करनेवाले आंदोलनकारियों के बराबर सम्मान, स्थान व प्रतिष्ठा दिये जाने की पहल आजादी के बाद शुरूआती दौर से ही की गई होती। लेकिन क्रांतिकारियों के प्रति कांग्रेस का रवैया कैसा रहा इसका प्रमाण तमाम मामलों में समाने आता रहा है। यहां तक कि आजादी के बाद इन क्रांतिकारियों के परिजनों की कभी सुध लेने की भी कांग्रेस की सरकारों ने जहमत नहीं उठाई और यहां तक कि चंद्रशेखर आजाद की दाने-दाने को मोहताज मां जगरानी देवी को जीते-जी कोई सुविधा नहीं देनेवालों ने वर्ष 1953 में उनकी मृत्यु के बाद झांसी के स्थानीय लोगों की भारी मांग के बावजूद उनकी प्रतिमा तक स्थापित करने की इजाजत नहीं दी। बल्कि ऐसा करनेवालों पर प्रशासन ने गोली तक चला दी जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई। यह आजाद भारत में कांग्रेस की सरकार ने ही किया था। वह कांग्रेस ही थी जिसने सुभाषचंद्र बोस की पत्नी को भारत में कदम रखने की इजाजत नहीं दी। वह कांग्रेस ही थी जिसकी नजर में आज तक भारत रत्न पाने का पहला अधिकार केवल गांधी-नेहरू परिवार में पैदा हुए लोगों उनके संवकों का ही है। ऐसे तमाम किस्से हैं जो यही दर्शाते हैं कि कांग्रेस ने कभी देश पर मर-मिटनेवाले क्रांतिकारियों को वैसा सम्मान देना गवारा ही नहीं किया जैसा राजनीतिक तरीके से आजादी का आंदोलन चलानेवालों को दिया गया। यहां तक कि कांग्रेस के शासनकाल में स्कूल-काॅलेजों के पाठ्यक्रम में भी क्रांतिकारियों को आतंकवादी व उपद्रवकारी बताने की कई बार साजिश की गई लेकिन ऐसी तमाम कोशिशों के विरोध में उभरे जनाक्रोश के कारण वह साजिशें कामयाब नहीं हो सकीं। ऐसे में अब अगर भाजपा की ओर से इस गैरबराबरी को समाप्त करने की पहल हो रही है और सावरकर को भारत रत्न देने की बात कही जा रही है तो इसका स्वागत करने के बजाय इस पूरी कोशिश को राजनीति में उलझाने का प्रयास किया जाना यह बताने के लिये काफी है कि आजादी के आंदोलन का राजनीतिक दोहन करके जनसंवेदना पर एकाधिकार जमाए रखने की कांग्रेस की सोच में अभी तक कोई तब्दीली नहीं आई है। निश्चित तौर पर इस तरह की सोच को दुखद ही कहा जाएगा।