भारतीय लोकतंत्र के हीरो थे टीएन शेषण
November 12, 2019 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

टीएन शेषण की मृत्यु पर मीडिया और राजनीतिक हलकों में सीमित जगह ही क्यों मिली, क्या उन्हें विशेष जगह नहीं मिलनी चाहिए थी, उनकी लोकतात्रिक सुधार की वीरता पर विस्तृत चर्चा नहीं होनी चाहिए थी? देश की वर्तमान पीढी को यह नहीं बताया जाना चाहिए था कि टीएन शेषण की लोकतांत्रिक वीरता क्या थी, लोकतंत्र को उन्होंने कैसे समृद्ध बनाया था, वोट के महत्व को उन्होने कैसे समझाया था, वोट लूट को उन्होंने कैसे रोका था, बूथ कब्जा की राजनीतिक संस्कृति को उन्होंने कैसे जमींदोज की थी, लोकतंत्र का हरण कर राजनीतिक सत्ता पर विराज मान होने वाले लठैत-अपराधी किस्म के राजनीतिज्ञों की आंख के किरकिरी वे कैसे बने थे, फिर भी वे हार नही मानी थी, आज चुनाव सुधार की जितनी भी प्रक्रिया चल रही है, आज चुनाव सुधार के जितने भी कानून अस्तित्व में आये हैं, उसकी बुनियाद में टीएन शेषण की ही वीरता रही है। उसके पूर्व चुनाव आयोग को रीढविहीन, दंत विहीन संस्थान का दर्जा प्राप्त था, जिसके पास न तो कोई विशेष अधिकार थे और न ही चुनाव आयोग के सिर पर पर बैठे अधिकारियों की कोई अपनी पैनी दृष्टि होती थी, ये सिर्फ और सिर्फ सरकार के गुलाम के तौर पर खडा होते थे, सरकार की इच्छाओं को ही सर्वोपरि मान लेते थे। खास कर सत्ता धारी दल यह नहीं चाहता था कि चुनाव आयोग रीढशील बने, दंतशील बने, अगर ऐसा होता तो फिर सत्ताधारी दल के लिए फिर से सत्ता में लौटने की सभी आशाएं चुनाव से पूर्व ही समाप्त हो जाते। हथकंडों को अपना कर चुनाव जीतना सत्ताधारी पार्टी का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा होता था। हथकंडों में विरोधी वर्ग और विरोधी क्षेत्रों में वोटर पंजीकरण में धांधली कराना, फर्जी वोटर पंजीकरण कराना, बुथ कब्जा कराना और कमजोर वर्ग के लोगों को मतदान केन्द्रों से दूर रहने के लिए षडयंत्र रचना शामिल थे।
                  टीएन शेषण ने गुमनामी में शेष जिंदगी क्यों गुजारी, यह भी एक प्रश्न है? इस प्रश्न पर भी गंभीरता के साथ चर्चा करना जरूरी है। देखा यह गया है कि शीर्ष नौकरशाही के पद पर बैठा शख्त सेवा निवृति के बाद भी गुमनामी मे नहीं जाता है, ख्यात जिंदगी में ही वह सक्रिय होता है, कोई नौकरशाह राज्यपाल बन जाता है, कोई नौकरशाह प्राधिकरणों में जज हो जाते हैं, तो कोई नौकरशाह राज्य सभा और लोकसभा के सदस्य बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त भी नौकरशाह खेल खेलते रहते है। कोई नौकरशाह रिलायंस का सलाहकार बन जाता है तो कोई नौकरशाह अडानी का सलाहकार बन जाता है, इनके बनाये संस्थानों का चीफ बन जाता है। इस प्रकार नौकरशाह शेष जिंदगी भी आराम और धाक के साथ गुजारता है। अब यहां यह प्रश्न भी उठता है कि सेवानिवृति के बाद भारत सरकार या फिर राज्य सरकारे भी टीएन शेषण की सेवाएं वैसी जगह क्यों नहीं ली जहां पर उनकी ईमानदारी, उनकी कर्मठता और उनके समर्पण की जरूरत थी और उनकी ईमानदारी, उनकी कर्मठता और उनके समर्पण से आम जनता को लाभ होता, आम जनता को न्याय मिलता? सेवा निवृति के बाद टीएन शेषण एक तरह से गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए विवश थे। एक तरह से वे अकेलापन के शिकार थे। वे दिल्ली छोडकर चेन्नई चले गये थे। दिल्ली का पंच सितारा संस्कृति और लूट-खसौट की दुनिया उन्हें पंसद नहीं थी, उनकी ईमानदारी ये सब पंसद नहीं करती थी। चेन्नई में भी वे अकेला ही महसूस करते थे। उनका कोई परिवार नहीं था। उनके बच्चे नहीं थे। परिवार से भी उनका विशेष लगाव नहीं था। शायद उनका अपना कोई आवास भी नहीं था। अनाथालय में वे रहते थे, सेवानिवृति से मिलने वाली अंशराशि से उनका जीवन चलता था। जब आप ईमानदार होंगे, जब आप सिद्धातशील होंगे, जब आप लूट-खसौट की संस्कृति से दूर रहेंगे, किसी को वर्जित ढंग से लाभ नहीं करायेंगे तो फिर आपका इस दुनिया में कोई मित्र भी नहीं होगा, आपको पंसद करने वाला सीमित लोग होंगे। सीमित लोग भी आस पास नहीं होते हैं वे दूर-दूर रहकर ही प्रेरणा लेते हैं। ऐसी श्रेणी के वीर शख्त को भी लोग पागल कह कर अपनानित करते हैं। लूटेरे वर्ग और राजनीतिक हलका भी टीएन शेषण को पागल ही कहा करते थे।
               लेकतांत्रिक सेनानी होने के कारण मैंने ही नहीं बल्कि टीएन शेषण की वीरता को देखने वाली पीढी यह जानती थी कि लोकतांत्रिक पद्धति हमारी कितनी दुरूह और मकडजाल और फेरब से भरी पडी थी। कमजोर वर्ग चुनाव लडने का साहस नही कर सकता था, चुनाव पर बडे लोगों, बडी जातियों, धन पशुओं और अपराधियों का राज रहता था, ये जिसे चाहते थे वही चुनाव लड सकते थे, इनकी इच्छा के बिना कोई चुनाव नहीं लड सकता था। कोई चुनाव लडने का साहस करता तो उसकी हत्या होती , उसके प्रताडना निश्चित था, नामंकन प्रक्रिया को दोषपूर्ण ठहरा कर नामंकन रद करा दिया जाता था। सबसे बडी बात यह थी कि दलित, आदिवासी और कमजोर जातियों के क्षेत्र में मतदान प्रक्रिया में अपराधी हावी होते थे, बूथ कब्जा आम होता था। दलित, आदिवासियों और कमजोर जातियों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता था। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि चुनाव जीत चुके उम्र्मीदवारों को भी चुनाव जीतने के प्रमाण पत्र मिलने के पूर्व हेराफेरी में हरा दिया जाता था और हारे हुए प्रत्याशी को जीता दिया जाता था। इस अपराध क्रम की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती थी, न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने के कारण सब बअर्थ हो जाती थी। लोमहर्षक बात यह थी कि चुनाव कर्मचारी बेलगाम होते थे, उनकी मर्जी ही चुनाव नियम होती थी। इनकी मर्जी अनियंत्रित हुआ करती थी। इनके खिलाफ सुनवाई कहीं नहीं होती थी। केन्द्रीय चुनाव पूरे देश में एक ही दिन हुआ करते थे, राज्य चुनाव भी एक ही दिन हुआ करते थे। ऐसी स्थिति में चुनाव सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं हुआ करती थी। 
           टीएन शेषण ने चुनाव आयुक्त के पद पर बैठते ही अपनी वीरता दिखायी। खास कर बिहार के जातिवादी राजनीति के उदाहरण लालू प्रसाद यादव से टकरा बैठे। उन्होने बिहार में चुनाव अधिकारियों को अपने हथियारों का डर दिखाया, पक्षपात करने पर दंड के भागीदार बनाने का हस्र दिखाया, कई चरणों में चुनाव प्रक्रिया करने की नियम बना डाला। कई चरणों में चुनाव होने की खबर सुनते ही बिहार ही क्यों देश भर में तहलका मच गया। लालू अपने व्यवहार के अनुसार प्रतिक्रिया दी थी, लालू ने कहा था कि इ शेषणवा पगला गया है, इ शेषणवा पागल सांढ हैं, इस पागल साढ को हम पकड कर कमरे में बंद कर देंगे या फिर गंगा में बहा देगे। पर टीएन शेषण पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा। टीएन शेषण ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान अपराधियों को जेल भेजवाने का फरमान सुना दिया, चुनाव प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों का स्थानंतरण या पदोन्नति को रोक दिया। लालू ही नहीं बल्कि अनेकानेक राजनीतिज्ञ टीएन शेषण के चुनाव सुधार दंड प्रक्रिया के शिकार हुए थे। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद को अपना इस्तीफा सौंपना पडा था। उनका दोष था कि वे चुनाव के दौरान मध्य प्रदेश के सतना जाकर अपने पुत्र के लिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की थी। राजनीतिज्ञ और केन्द्रीय मंत्री रहे कल्पनाथ राय को भी टीएन शेषण का कोपभाजना बनना पडा था। उस दौरान राजनीति में टीएन शेषण भयभीत करने वाले शख्त के तौर पर विराजमान थे। राजनीति में एक चर्चा आम थी कि राजनीतिज्ञ सिर्फ भगवान और टीएन शेषण से ही डरते हैं। एक नौकरशाह के रूप में भी उनकी ख्याति गजब की थी। मंत्री उनसे पीछा छुडाना चाहते थे और उनके अंदर काम करने वाले अधिकारी व कर्मचारी मुक्ति का मार्ग तलाशते थे। 
            हमें घोर आश्चर्य है कि टीएन शेषण की सेवाएं सरकारें उनकी सेवानिवृति के बाद भी क्यों नहीं ली उनकी सेवाएं ली जानी चाहिए थी। खास कर देश की अकादमियां उनकी सेवा ले सकती थी। टीएन शेषण देश की भावी पीढी को सजग, कर्मठ और ईमानदार बनाने की शिक्षा दे सकते हैं, उन्हें प्रेरक राह दिखा सकते थे। दुखद यह है कि उन्हें गुमनामी में जिंदगी गुजारने के लिए छोड दिया गया। अगर हम ईमानदारी और कर्मठता का सम्मान नहीं करेंगे तो फिर देश में भ्रष्टचार, बईमानी और वर्जित कार्य की बढती प्रवृति को कैसे रोक पायेंगे? यह एक यक्ष प्रश्न है। टीएन शेषण की लोकतांत्रिक वीरता को बच्चों के पाठय पुस्तक में शामिल किया जाना चाहिए।