देशी मजदूरों पर डाॅलर संस्कृति का चलता बुलडोजर
May 13, 2020 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

देशी और विदेशी भारतीय श्रमिकों में फर्क अमानीय है। देश की अर्थव्यवस्था की कसौटी पर आत्मघाती है, खतरनाक है। प्राकृतिक सिद्धांत के खिलाफ भी है। पर सत्ता संस्थान और उंच वर्ग के लिए यह फर्क कोई अमानवीय नहीं होता, अर्थव्यवस्था की कसौटी पर आत्मघाती नहीं होता है? क्या यह रूपये और डाॅलर की मानसिकता से उत्पन्न स्थिति है? क्या यह रूपये के निम्न और डाॅलर के खास होने के बीच का संघर्ष एवं सोच का दुष्परिणाम है? आखिर ऐसा क्यों है? इसके पीछे कारण क्या है? 
             वास्तव मे खास लोग हमेशा सम्मान हासिल कर लेते हैं, लूट लेते हैं, खरीद भी लेते हैं, सत्ता पर बैठे लोग भी इन्ही के चंगुल में फंस जाते हैं और इनके लिए गुलाम बन जाते हैं। ऐसा सिर्फ श्रम की कसौटी पर ही नहीं होता है बल्कि हर कसौटी पर होता है। हम सब भी इसके शिकार है और हमारी मानसिकताएं भी ऐसी ही है। हम कमजोर के साथ खड़ा नहीं होना चाहते हैं, कमजोर के साथ खड़ा होने में हमें शर्म आती है और हम अपने सम्मान के खिलाफ मानते हैं। जबकि खास के साथ खड़ा होने में हम गर्व महसूस करते हैं और सम्मान की बात समझते हैं। यह अलग बात है कि समय पड़ने पर खास आपकी मदद के लिए कभी आने वाला नहीं है। अगर खास लोग किसी की मदद करते हैं तो उसके पीछे अधिकतर लोभ लालच और छुपा हुआ एजेंडा होता है। खास वर्ग के लोग यूज एंड थ्रो करना खूब जानते हैं।
                        कोरोना काल में श्रमिकों का यह विभाजन साफ झलक रहा है। भारतीय विदेशी मजदूर जो खाडी के देशों में काम करते हैं और देश के अंदर जो मजदूर काम करते हैं उनकी मदद और उन्हें घर तक पहुचाने में न केवल भेदभाव साफ परिक्षलिक्षत हुआ है बल्कि अमानवीय भी है। अब प्रश्न यह उठता है कि भेदभाव कैसे और अमानवीय कैसे है? सबसे पहले हम भारतीय विदेशी मजदूरों के लिए कोरोना संकट से निकलने के लिए किस प्रकार की सहायता हुई है और यह सहायता भारत सरकार से निशुल्क कि प्रकार से हुई है, यह सब भी जगजाहिर है। खासकर अरब के देशों मे लाखों भारतीय विदेशी मजदूर हैं। ये भारतीय विदेशी मजदूर खास किस्म के हैं, ये उंच प्रशिक्षित मजदूर हैं, जो टेक्नोलाॅजी के हैंडिल करने में भी माहिर हैं। पर इनकी खासियत यह हे कि इन्हें देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए खास श्रमिक व्यवस्था को गति देना स्वीकार नहीं था। देश में इन्हें काम मिल सकता था, देश के उद्योगों को भी इनकी आवश्यकता थी। आज भारतीय उद्योगों को अच्छे और प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी से गुजरना पड़ रहा है। अच्छे और प्रशिक्षित मजदूर आसानी से उपलब्ध होते तो निश्चित तौर पर भारतीय उद्योग धंघों को मजबूती मिलती। पर देश की सरकार ने विभिन्न नीतियों से जो प्रशिक्षित मजदूर बनाये वह मजदूर देश के लिए काम नहीं आये। ये अरब देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए चले गये। अरब देशों में विकास के लिए अच्छे और प्रशिक्षित मजदूरों की जरूरत थी। अरब देशों की इस जरूरत को भारतीय मजदूर पूरा करते हैं। वहां पर ये प्रताड़ित भी होते हैं और अपमानित भी होते हैं। फिर भी उन्हें अपनी देश की अर्थव्यवस्था याद नहीं आती है। एक यह प्रचारित किया जाता है कि अरब से हमारे मजदूर विदेशी मुद्रा भेजते है, इसलिए अरब में काम करने वाले मजदूर हमारे देश के लिए खास हैं।
                           कोरोना काल में इस खास भारतीय विदेशी मजदूरों के लिए खास तरह से मदद हो रही है। अरब के देश भी कोरोना से त्राहिमाम कर रहे हैं और अरब के देशों में कोरोना सक्रमण के खतरे बढे हैं, बडी संख्या मे मौतें भी हो रही हैं। अरब के देशों में लाॅकडाउन है। लाॅकडाउन के दौरान भारतीय विदेशी मजदूर खाली बैठे हैं और समाचार तो यहां तक आया है कि सैकड़ों भारतीय विदेशी मजदूरों की कोरोना सक्रमण से मौत हो गयी है। अंतर्राष्टीय उड़ाने भी स्थगित हैं। इस कारण उनकी भारत वापसी संकट में थी। भारत सरकार ने इन्हें घर वापसी कराने के लिए हवाई जहाज भेज रही है। हजारों भारतीय विदेशी मजदूरों को हवाई जहाज और समुद्री जहाजों से लाया जा रहा है। उन पर बहुत बडी कृपा हो रही है। उनसे टिकट के लिए पैसे भी नहीं लिये जा रहे हैं। प्रचारित यह किया जा रहा है कि कोरोना संकट के कारण उनके पैसे समाप्त हो गये हैं और उनकी कंपनी बंद होने के कारण पैसे नहीं मिल रहे हैं। इस कारण उनके पास टिकट के लिए पैसे नहीं है। अब यहां यह प्रश्न उठ रहा है कि जब वर्षो-महीनोें अरब में मजदूरी करने के बाद भी उन्हें टिकट के लिए पैसे भी नहीं बचे हैं तो फिर ये देश छोड़कर ही क्यों गये थे? सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इन्हें देश लाने के बाद शानदार क्वाइनटाइन में रखा जा रहा है जहां पर फाइव स्टार की सुविधा प्राप्त है। क्वाइनटाइन के बाद उनके घरों तक पहंचाने की भी व्यवस्था है।
                इसके विपरीत देशी मजदूरांे की स्थिति पर भारत सरकार और राज्यों की सरकारों का विश्लेषण कर देख लीजिये। अचानक डाॅकडाउन के बाद इनके उपर तो ब्रजपात हो गया। इन्हें अपने घरों की ओर लौटने का कोई अवसर नहीं था। उनके रहने और खाने पीने के लिए कोई खास व्यवस्था नहीं है। काम बंद होने से उनकी मजदूरी भी नहीं रही। जिन जगहां पर ये असंगठित मजदूर काम कर रहे थे उन जगहों पर काम बंद होने के कारण पिछला बकाया भी उन्हें नहीं मिला। अचानक हुए लाॅकडाउन के कारण सभी जिम्मेदारियां राज्य सरकारों के उपर आ गयी। राज्य सरकारों ने खूब आश्वासन दिया था और कहा था कि सभी मजदूरों को खाने-पीने की व्यवस्था होेगी और उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी। राज्य सरकारों ने कुछ मजदूर आश्रय जरूर बनाये थे पर उन मजदूर आश्रय में कोई व्यवस्था नही थी, खाना कब मिलेगा, कितना मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं थी, सिर्फ खाना ही किसी तरह मिल रहा था, शेष जरूरी सुविधाएं नहीं थी। लाॅकडाॅडन के दौरान देशी मजदूरो को घर पहुंचाने की कोई नीति नही बनी। लाॅकडाउन के दौरान मजदूरों की घर वापसी का अभियान चलाया जाना चाहिए था। पर चला भी तो काफी देर से और वह भी सीमित स्तर पर । खबरें यहां तक थी रेलगाड़ियों में सफर के लिए मजदूरों  से पैसे लिये गये। अर्थ उनकी यह यात्रा निशुल्क नहीं थी। मजदूर किस प्रकार से पैदल ही दो सौ किलोमीटर से लेकर 1500 किसोमीटर तक की दूरी तय कर अपने घरों मे पहुंचे। रास्ते में न जाने कितने मजदूरो की मौत हो गयी। महाराष्ट में इस दौरान रेल पटरी पर सोये हुए 14 मजदूरो की दर्दनाक मौत हो गयी। ये मजदूर घर लौटने के क्रम में थकान के कारण रेल पटरियो पर सोये हुए थे। इनके लौटने का मार्ग रेल पटरियां ही थी। ये देसी मजदूर घर वापसी में कितने संकट झेले हैं, यह भी जगजाहिर है। क्योकि लाॅकडाउन के दौरान सभी दुकानें बंद थी, इसलिए इन्हें भूखे-प्यासे ही गुजरने के लिए बाध्य होना पड़ा।
                             देशी मजदूर घर तो अपने बल पर पहुंच गये पर उनकी समस्याएं फिर पीछा नहीं छोड़ी। कोरोना सक्रमण के कारण उन्हें गांव में घुसने नहीं दिया गया, परिवार के बीच जाने नहीं दिया गया। सरकारी आदेश के अनुसार उन्हें क्वाइटाइन सेंटर भेज दिया गया। क्वाईटेाइन सेंटर एक तरह से कोई व्यवस्था नहीं थी। देश के कई जगहों पर स्थित क्वाइटाइन सेंटर पर मजदूरो द्वारा विरोध प्रदर्शन की खबरे भी मीडिया के अंदर में प्रकाशित और प्रसारित हो चुकी हैं। सरकारी अधिकारी मजदूरों के क्वाइटाइन सेंटर चलाने के नाम पर गोरखधंघे शुरू किये हैं।
                          देशी मजदूर हों या फिर विदेशी भारतीय मजदूर, इनके बीच फर्क करना सही नही है। खासकर देशी मजदूरों के साथ इस तरह का व्यवहार चिंताजनक है। देशी मजदूर सही में हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ हैं। अगर देशी मजदूर पूरी तरह खेती व्यवस्था पर चल निकले तो फिर देश की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल हो सकता है। फैक्टरियां का धुंआ निकलना बंद हो जायेगा, बड़े शहरों का निर्माण और घरेलू कार्य पूरी तरह से ठप हो जायेगा। यह डर तो अभी से ही साफ झलक रहा है। जब मजदूर अपने-अपने गांव और अपने-अपने प्रदेश लौट चुके हैं तब सरकारों और प्राइवेट कंपनियों को डर सताने लगा। डर इस बात का हे कि अब उन्हें मजदूर कहां से मिलेगा, अगर मजदूर नहीं मिलेगा तो फिर सरकारी कार्य कहां से होंगे, उद्योग-धंधों का काम कैसे चलेगा?
केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों को देशी मजदूरों के प्रति उदासीनता छोड़नी होगी, उन्हें भेदभाव का शिकार बनाने की नीति छोड़नी होगी। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मजदूरों के कल्याण सहित अन्य कल्याण के लिए 20 लाख करोड़ के विशेष पैकेज की घोषणा की है। इस विशेष पैकज से देशी मजदूरों के कल्याण की सही व्यवस्था होनी चाहिए।