गंगा-जमुनी संस्कृति पर मंडराता संकट
October 19, 2019 • राकेश रमण
भारत को विविधता में एकता का देश कहा जाता है। यहां की विविधता ही इसकी खूबसूरती भी रही है और ताकत भी। यहां का सामाजिक ढ़ांचा ही ऐसा रहा है जिसमें हर जाति, मजहब, धर्म, संप्रदाय, भाषा, और क्षेत्र के लोग एक दूसरे के साथ समन्वय बनाकर रहते रहे हैं। बेशक विविधता में एकता की अवधारणा को खंडित करने का प्रयास भी समय-समय पर होता रहा है और इसके कारण होने वाले दंगों व उपद्रवों का भी लंबा इतिहास है लेकिन समग्रता में यह देश कभी किसी एक मत, पंथ या संप्रदाय की बपौती नहीं रहा। सबने इसके विकास में बराबर का योगदान दिया है और किसी ने कभी दूसरे का वर्चस्व स्वीकार नहीं करके भी सबके लिये आदर व स्वीकार्यता का भाव अपनाए रखने से गुरेज नहीं किया। तभी तो आजादी से पूर्व जब सांप्रदायिक आधार पर देश का बंटवारा होने के बाद पाकिस्तान के रूप में अलग इस्लामिक देश अस्तित्व में आया तो भारत को स्वाभाविक तौर पर हिन्दू राष्ट्र बनाए जाने की मांग भी उठी। लेकिन हमारे संविधान निर्माताओं और तत्कालीन राष्ट्र निर्माताओं ने भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के तौर पर ही आगे ले जाना बेहतर समझा जहां धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं रहने दी गई। उल्टा अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा और उन्हें मुख्यधारा में आगे आने का मौका देने के लिये कई कदम उठाए गए। इसी का नतीजा है कि आज गर्व से हम अपने देश को विविधता में एकता की भूमि कहते हैं और समूचा विश्व हमारे इस सामाजिक ढ़ांचे और तानेबाने की मजबूती को सलाम करता है। लेकिन इस समय देश का सामाजिक ढ़ांचा जिस संकट के दौर से गुजर रहा है उसकी अनदेखी कर पाना दिनों दिन नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता जा रहा है। हालांकि इसके लिये किसी एक वर्ग को ही पूरे तौर पर दोषी नहीं बताया जा सकता क्योंकि कोई भी पक्ष दूध का धुला अथवा पूरी तरह बेदाग नहीं है। लेकिन सवाल है कि एक ओर कोई पक्ष अपने शरारती तत्वों की अनदेखी कर रहा हो तो दूसरा पक्ष क्यों नहीं चिढ़ेगा। आखिर विविधता में एकता के तानेबाने की रक्षा करना किसी एक की ही जिम्मेवारी कैसे हो सकती है। इसमें योगदान सबको देना होगा तभी देश की गंगा-जमुनी संस्कृति बच पाएगी। वर्ना गंगा का मतलब काशी और यमुना का मतलब मथुरा होने में देर नहीं लगेगी। हालांकि यह सच है कि समाज के सभी वर्गों के भीतर छिपे-बैठे शरारती तत्वों की तादाद महज गिनी-चुनी और मुट्ठी भर ही है लेकिन इनकी हरकतों का खामियाजा पूरी कौम को उठाना पड़ता है। ऐसे में यह हर कौम की जिम्मेवारी है कि वह अपने आस्तीन में पल रहे सांपों की पहचान करके उसकी खुलकर मजम्मत करें। लेकिन अफसोस की बात है कि अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर सहिष्णुता और सामंजस्य की सोच लगातार क्षीण होती जा रही है। तभी तो बीते दिनों पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जब एक शिक्षक और उसकी गर्भवती पत्नी को ही नहीं बल्कि उसके आठ साल के इकलौते बेटे को भी बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया तब कहीं कोई पत्ता नहीं खड़का। बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा तबका खामोश रहा ताकि गंगा-जमुनी संस्कृति पर आंच ना आए जबकि कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कातिलों को सजा दिलाने की मांग भी की तो उसकी अनदेखी कर दी गई। बाद में प्रदेश के सरकारी तंत्र ने कथित तौर पर मामले को उलझाने और निपटाने के लिये बेहद बचकानी जांच रिपोर्ट पेश करके असली कातिलों को बचा लिया और हत्या की असली वजह सामने ही नहीं आने दी। लेकिन इसके खिलाफ देश के उन बुद्धिजीवियों की खामोशी देखने लायक थी जिन्होंने हालिया दिनों तक समाज में बढ़ रही असहिष्णुता के मामलों को तूल देकर आसमान सिर पर उठाया हुआ था। खैर, गंगा-जमुनी संस्कृति की रक्षा के लिये पीड़ित पक्ष ने अपनी जुबान बंद कर लेना ही बेहतर समझा। लेकिन उसके बाद अब मामला सामने आया है लखनऊ से जहां एक कट्टर हिन्दूवादी नेता के घर में घुसकर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई है। घटनास्थल से बरामद मिठाई के डिब्बे, सीसीटीवी फुटेज और मोबाइल की लोकेशन के अलावा हासिल प्रमाणों और मुखबिरों से मिली सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई करते हुए उत्तर प्रदेश और गुजरात की पुलिस ने आरोपियों के अलावा उनको ऐसा करने के लिये उकसाने वालों की भी गिरफ्तारी कर ली है तो कातिलों की मजम्मत करने के बजाय मृतक के मां की एक वीडियो फुटेज वायरल करके मसले को राजनीतिक रंग देने का कुत्सित प्रयास आरंभ हो गया है। यह बात सही है कि मृतक की विचारधारा बेहद ही अफसोसनाक और आपत्तिजनक थी जिससे कोई भी समझदार आदमी कतई सहमत नहीं हो सकता। लिहाजा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसकी कुछ राजनीतिक दुश्मनियां भी रही होंगी और कईयों के साथ उसका वैचारिक व सैद्धांतिक टकराव भी हुआ होगा। लेकिन जहां तक उसकी हत्या कर देने का सवाल है तो उसके पीछे की असलियत वह नहीं है जिसका शक उसकी मां जता रही है। फिर भी मामला अदालत में जाएगा तो उसकी कलई भी खुल ही जाएगी। लेकिन फिलहाल तो तस्वीर यही है कि असहिष्णुता का प्रदर्शन अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े लोगों ने ही किया है जिन्हें अपने मजहब को लेकर कही गई बातें सहन नहीं हुईं और उन्होंने उसकी हत्या करने वाले के लिये इनाम की भी घोषणा की हुई थी। ऐसे में आरोपी के समाज के भीतर से ही कातिलों के खिलाफ आवाज बुलंद होनी चाहिये थी और मृतक के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन होना चाहिये था। लेकिन अफसोस की बात है कि मुर्शिदाबाद के मामले की ही तर्ज पर इस मामले में भी समाज का वह वर्ग अपने भीतर छिपे शरारती तत्वों के हरकतों की अनदेखी करता हुआ दिखाई पड़ रहा है। यानी तस्वीर ऐसी उभर रही है मानो देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को बचाने की जिम्मेवारी सिर्फ बहुसंख्यक समाज की ही हो। यह स्थिति निहायत ही चिढ़ पैदा करनेवाली है जिसका परिणाम समाज के विखंडन और टकराव के रूप में ही सामने आएगा। लिहाजा आवश्यक है कि देश में सामाजिक टकराव या विभाजन की स्थिति उत्पन्न ना होने दी जाए और समाज के सभी वर्ग अपनी जिम्मेवारियों को समझें। कट्टरवादी शरारती व खुराफाती तत्वों का पूर्ण बहिष्कार होना चाहिये और इसमें यह नहीं देखना चाहिये कि वह किस मत, पंथ, संप्रदाय, क्षेत्र या भाषा से जुड़ा हुआ है।