जाने क्या ढूंढ़ती है मेरी निगाहें
October 10, 2019 •   मंगल व्यास भारती

                             जाने क्या ढूंढ़ती हैं मेरी निगाहें.

गुजरे हुए लमहो के इशारों में।
इधर उधर भटकती पल पल ये.
समंदर की लहरों के इशारों में।
जाने अतीत की छुपी यादें दिल की.
दरों दीवारों से आवाज देती इशारों में।
हर जख्म का हिसाब कर निकली.
चेहरा बदल इस कड़ी धूप के इशारों में।
ऐसा क्याखौफ है जो निकली है.
बदलती तकदीर के इशारों में।
जाने जिंदगी में बहुत कुछ खोया.
बार बार चलती डर के इशारों में।
पलकें भरी रहती किसी की याद में.
जो गम के अशक बन ठहरे इशारों में।
क्या कहूं वो रात थी कयामत भरी.
जो हम जुदा हुए एक दूसरे से इशारों में।
ये दीवानी मस्तानी निगाहें आवाज देकर बुला रही इशारों में।
कहें भारती वक्त गुजर जाता है मगर.
खवाब बनकर धड़कते है इशारों में।

मंगल व्यास भारती

चूरू राजस्थान