जमीयत का बेमानी असंतोष
November 6, 2019 • राकेश रमण
(राकेश रमण)
भाजपा और संघ परिवार की राष्ट्रवादी नीतियों के प्रति अक्सर नरम रूख का प्रदर्शन करनेवाले जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने बेहद नाटकीय तरीके से केन्द्र सरकार की मौजूदा रीति-नीति को लेकर अपनी असहमति का इजहार करने में कोई संकोच नहीं किया है। कल तक विभिन्न मसलों पर मोदी सरकार की सबका साथ सबका विकास के साथ कदमताल करते दिख रहे जमीयत का अचानक पैंतरा बदलना यह बताने के लिये काफी है कि वह दिखावे के तौर पर भले ही मजबूरन संघ और भाजपा का विरोध करने से परहेज कर रहा था लेकिन मौका मिलते ही पहली फुर्सत में सरकार पर सटीक प्रहार करने के लिये वह तैयार बैठा है। तभी तो एक ओर हरियाणा और महाराष्ट्र में बहुमत का आंकड़ा हासिल नहीं कर पाने की राजनीतिक टीस और अर्थव्यवस्था की सुस्ती के बीच उत्पादन की घटती व खुदरा महंगाई दर के बीच संतुलन बिठाने की जद्दोजहद कर रही सरकार को समस्याओं में घिरा देख कर उसने हमले का सिलसिला शुरू करने में कतई देर नहीं लगाई है। इसके लिये मौका भी चुना गया है अयोध्या विवाद का निर्णायक फैसला आने से ठीक पहले का ताकि अगर अदालत का फैसला सरकार की उम्मीदों के अनुकूल ना आए तो वह अचानक एक ही झटके में संसद की शक्ति का इस्तेमाल करके मनमानी करने से पहले सौ बार सोचे। निश्चित तौर पर बेहद सोच समझ कर जमीयत ने सरकार पर हमलावर होने के लिये ऐसा मौका चुना है जब पहले से ही विभिन्न दबावों का सामना कर रही सरकार पर अलग से अल्पसंख्यकों के असंतोष का डर दिखा कर दबाव बनाया जा सके। लेकिन ऐसा करने के लिये जिन मुद्दों का सहारा लिया गया है वह ना सिर्फ बेमानी हैं बल्कि काफी हद तक राष्ट्रीय भावना और आम जन मानस के प्रतिकूल भी हैं। मसलन जमीयत ने सरकार को घेरने के लिये शगूफा छोड़ा है एनआरसी, अनुच्छेद 370, राम जन्मभूमि और कश्मीर सरीखे ऐसे मसलों का जिन पर राष्ट्रीय भावना का प्रकटीकरण पहले ही हो चुका है। जब ये मसले चर्चा में थे तब इन पर जमीयत ने खामोशी बनाए रखी। लेकिन अब सारे मसलों को एक साथ जोड़कर उसने सरकार पर सीधा प्रहार कर दिया है। एक ओर एनआरसी के मुद्दे को लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा दिये गये बयान को जमीयत ने निहायत ही आपत्तिजनक, निंदनीय व गैरजिम्मेदाराना बताया है जिसमें मुसलमानों के अलावा सभी अवैध घुसपैठियों को भारत की नागरिकता दिये जाने की बात कही गई है। वहीं दूसरी ओर कश्मीर के मामले में केन्द्र सरकार की कार्यप्रणाली को दोषपूर्ण बताते हुए जमीयत ने कहा है कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिये बातचीत का दरवाजा खुला रखा जाना चाहिये और कश्मीर के लोगों की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाना चाहिये। हालांकि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के मसले पर साफ शब्दों में कुछ भी कहने से बचते हुए जमीयत ने कहा है कि चुंकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है लिहाजा उम्मीद की जानी चाहिये कि कश्मीरियों को इंसाफ अवश्य मिलेगा। लेकिन अयोध्या विवाद को लेकर जमीयत ने उम्मीद जताई है कि अदालत का फैसला ठोस तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर ही आएगा न कि धर्म के आधार पर। दिखावे के तौर पर जमीयत ने अदालत के किसी भी फैसले को तहे दिल से कबूल करने और हर हाल में देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र व आपसी भाईचारा बनाए रखने की अपील भी की है लेकिन लगे हाथों मस्जिद पर अपना दावा नहीं छोड़ने की बात कहने से भी संकोच नहीं किया है। जमीयत ने एक बार फिर वही पुराना राग आलाप है जो निचली अदालत से लेकर इलाहाबार उच्च न्यायालय द्वारा भी खारिज किया जा चुका है और पुरातत्व सर्वेक्षण की खोदाई में भी वह दलील गलत साबित हो चुकी है। जमीयत के मुताबिक बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी हिंदू मंदिर को तोड़े बगैर किया गया था और कानून और न्याय की दृष्टि में वह करीब 400 साल तक मस्जिद थी, इसलिए शरीयत के लिहाज आज भी वो एक मस्जिद है और कयामत तक मस्जिद ही रहेगी। मस्जिद पर अपना दावा नहीं छोड़ने की बात कहते हुए उसने यह उम्मीद भी जताई है कि अदालत का फैसला उसकी भावना के अनुकूल ही आएगा। अब सवाल है कि अगर अदालत के फैसले को पूरे मन से स्वीकार करने की बात वह कह भी रहा है तो इसी उम्मीद में कि फैसला बाबरी के पूरी तरह खिलाफ नहीं आएगा। यानी उसे साफ दिख रहा है कि नौबत ऐसी आएगी जिसमें अदालत के फैसले को संसद की शक्ति से बदलने के लिये सरकार को मजबूर होना ही पड़ेगा। तभी तो उसने ऐसी पैंतरेबाजी आरंभ कर दी है कि ऐसा होने पर सरकार के खिलाफ मुसलमानों को भड़काने का आधार उसके पास पहले से ही तैयार रहे। वर्ना अयोध्या में जन्मभूमि होने की बात पहले ही साबित हो जाने के बावजूद विवादित जमीन पर अपना दावा कायम रखने का आखिर मतलब ही क्या है। वह भी तब जबकि मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करनेवाले कई संगठन इस पूरी जमीन को मंदिर निर्माण के लिये छोड़ने की बात कह चुके हैं और देश का सामान्य जन मानस भी एक सुर से इसके पक्ष में है। लेकिन जमीयत के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी के मन में कितना जहर भरा हुआ है इसकी झलक उनकी बातों से ही मिल जाती है जिसमें उन्होंने केन्द्र सरकार की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि इस समय देश आंतरिक और बाहरी दोनों स्तरों पर चुनौतियों से गुजर रहा है और हालात बेहद चिंताजनक हैं। मौलाना मदनी ने कहा कि हमारे मतभेद किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं हैं बल्कि हमारा विरोध हमेशा से ही उस विचारधारा से है जो देश की गंगा-जमुनी तहजीब और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को खत्म करने का काम करती है। मौलाना ने कभी गाय के नाम पर तो कभी जय श्रीराम के नाम पर धार्मिक जुनून पैदा करके देश की हिन्दू-मुस्लिम बुनियाद हिलाने की कोशिश को शर्मनाक करार देते हुए कहा कि आज की मौजूदा परिस्थितियों से कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग डरे सहमे हैं और एक अविश्वास की भावना लगातार बढ़ रही है। ऐसी बातें करके जमीयत के रहनुमां अपनी वही बाजी खेलने की कोशिश कर रहे हैं जिसको उनका समाज भी नकार चुका है। लिहाजा बेहतर होगा कि सरकार पर सियासी प्रहार करने के बजाय वे जन मानस की भावना के अनुरूप ही अपने विचार रखें ताकि उनकी बातों का वजन बरकरार रहे।