जम्मू कश्मीर पर नाहक सियासी जंग
November 19, 2019 • राकेश रमण
जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने, जमीनी स्तर पर एहतियातन पाबंदियां लागू किये जाने और सूबे के कुछ शीर्ष स्थानीय नेताओं व पूर्व मुख्यमंत्रियों को नजरबंद करके समाज से अलग-थलग किये जाने सरीखे मसलों को तूल देकर एक बार फिर विपक्ष की ओर से सरकार को नीचा दिखाने की कोशिशें की जा रही हैं। विपक्ष को दिक्कत इस बात से भी है कि आखिर यूरोपियन यूनियन के दक्षिणपंथी सांसदों की टोली को सूबे की जमीनी स्थिति दिखाने के लिये प्रदेश का भ्रमण क्यों कराया गया। वह भी तब जबकि अपने देश के विपक्षी सांसदों को वहां जाने से रोका गया और प्रदेश के कद्दावर नेता व राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद को भी एयरपोर्ट से ही वापस लौटा दिया गया। विपक्ष की ओर से यह बताने की कोशिश की जा रही है कि जम्मू कश्मीर के हालात कतई सामान्य नहीं हैं और सरकार की ओर से प्रदेश की स्थिति को लेकर गलत बयानी की जा रही है। इस मसले को तूल देने के लिये विपक्ष ने संसद के मंच का इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई है और इसके लिये सरकार ने भी अपनी सहमति दे दी है। बेशक सरकार ने संसद में कश्मीर के मसले को लेकर दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा कराने की मांग को स्वीकार कर लिया है लेकिन सरकार का प्रयास सूबे की सियासत में कोई भी हेरफेर करने से बचने का ही है। दरअसल इस पूरी रस्साकशी को अगर गहराई से देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आज की तारीख में जम्मू कश्मीर के मसले के दो अलग आयाम हैं। एक आयाम सूबे से जुड़ता है और दूसरा देश के बाकी हिस्सों से। इस लिहाज से देखें तो जम्मू कश्मीर के शीर्ष स्थानीय नेताओं की रिहाई को लेकर विपक्ष की ओर से काटे जा रहे बवाल के कारण राष्ट्रीय राजनीति में बेशक कुछ हलचल दिख रही हो लेकिन प्रदेश की जमीनी राजनीति पर इसका कोई प्रभाव पड़ता हुआ कतई महसूस नहीं हो रहा है। वैसे भी अगर पूर्व मुख्यमंत्रियों की रिहाई का मसला प्रदेश में इतना ही संवेदनशील होता तो इनकी अपनी पार्टियों के स्थानीय नेताओं की ओर से इस मामले में आंदोलन की राह अवश्य पकड़ ली गई होती। लेकिन हालत यह है कि जम्मू से लेकर कश्मीर घाटी तक में आम लोगों के बीच ना तो अब्दुल्ला परिवार को लेकर कोई सहानुभूति बची है और ना ही सईद परिवार के प्रति स्नेह बचा है। बेशक प्रशासन द्वारा अमल में लायी जा रही कुछ एहतियाती इंतजामों को लेकर आम लोगों को भी कुछ परेशानियों व दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और इसमें ढ़ील दिये जाने की मांग भी हो रही है। लेकिन प्रदेश के पूर्व शीर्ष नेताओं की आजादी को लेकर ना तो अब तक आम लोगों के बीच से कोई मांग उठी है और ना ही उनकी पार्टियों के कार्यकर्ताओं की ओर से इसके लिये अब तक कोई आंदोलन, प्रदर्शन या धरना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि सूबे के लोगों को भी बेहतर पता चल चुका है कि उनका नेतृत्व करने के नाम पर किसने कितनी मलाई काटी और उनकी कितनी भलाई की। इसके अलावा अब ना तो सूबे की स्वायत्तता का कोई मसला बचा है और ना ही अलगाववाद या पाकिस्तानपरस्ती के लिये कोई जगह बची है। ऐसे में भारतविरोधी अलगाववाद को हवा देकर राजनीतिक रोटियां सेंकते आ रहे अब्दुल्ला और सईद परिवार के प्रति आम लोगों की हमदर्दी में अभाव के हकीकत को समझने के लिये किसी राॅकेट साईंस की जानकारी होना कतई जरूरी नहीं है। अब फिजा भी बदल चुकी है और माहौल भी बदल गया है। वर्ना अगर पुरानी स्थिति बहाल होती तो इन नेताओं की नजरबंदी के खिलाफ पूरा सूबा सुलग रहा होता। लेकिन सच तो यह है कि कहीं से कोई आवाज नहीं उठ रही है। अगर प्रदर्शन और जुलूस की इजाजत नहीं मिलने की दलील सही भी है तो अपनी बात मनवाने के और भी तरीके हो सकते थे। उनका कोई भी समर्थक देश के किसी भी हिस्से में आमरण अनशन कर सकता था। ताकि सरकार पर दबाव बने और अपनी बात लोगों तक पहुंचाई जा सके। मगर अनशन की बात तो दूर रही, किसी ने धरना देने की भी जहमत नहीं उठाई। सब इस बात को समझ रहे हैं कि अगर सूबे में शांति का वातावरण बन रहा है तो इसकी बहुत बड़ी वजह इन नेताओं को समाज से अलग-थलग करना भी है। अगर इन्हें आजाद छोड़ा जाता तो ये अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये माहौल बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन दशकों तक जम्मू कश्मीर की राजनीति की धुरी बने रहे अब्दुल्ला और सईद परिवार की मौजूदा हालातों में सिमट रही ताकत से उत्साहित होकर ही भाजपा अब प्रदेश के पुराने छत्रपों पर कसे गये शिकंजे में जरा भी ढ़ील के मूड में कतई नहीं दिख रही है। हालांकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व लोकसभा सांसद फारूख अब्दुल्ला की तत्काल रिहाई की मांग को लेकर पूरा विपक्ष एकजुट दिखाई पड़ रहा है और इसी सिलसिले में विपक्ष की भारी मांग को देखते हुए शीघ्र ही संसद के दोनों सदनों में प्रदेश की मौजूदा स्थिति को लेकर विस्तृत चर्चा कराने पर सरकार को भी सहमत होना पड़ा है। लेकिन विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे दबावों के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला या महबूबा मुफ्ती की जल्दी रिहाई के आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। हालांकि जिन लोगों को भी नजरबंदी में रखा गया है उनकी सहूलियतों का पूरा ध्यान रखते हुए उन्हें तमाम सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं और नजरबंदी की जगह से बाहर निकलने पर प्रतिबंध के अलावा ना तो उन्हें इंटरनेट व टेलीफोन की सुविधाओं से वंचित किया गया है और ना ही अपने शुभचिंतकों से बातचीत करने से रोका जा रहा है। जाहिर है कि जमीनी स्थिति सामान्य होते ही उन पर लगे मामूली प्रतिबंधों को भी हटा लिया जाएगा लेकिन यह तो तय है कि सरकार का कोई भी फैसला विपक्ष के दबाव में कतई नहीं होगा। ऐसे में विपक्ष को भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिये ऐसे मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देने से पहले यह विचार अवश्य कर लेना चाहिये कि स्थानीय स्तर पर उस मसले को लेकर आम जनमानस का विचार क्या है। जब स्थानीय जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो राष्ट्रीय स्तर पर उस मुद्दे को तूल देने से कितना लाभ हो होगा इस पर विचार करके ही आगे बढ़ा जाये तो बेहतर होगा।