कश्मीर में बढ़ता राष्ट्रवाद और घटता आतंकवाद
May 7, 2020 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

भारतीय दृष्टिकोण से जम्मू-कश्मीर में राष्टवाद की मौत उसी दिन हो गयी थी, जिस दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर रियासत के भारत में विलय पर सरदार पटेल के हाथ बांध दिये थे और विलय का प्रश्न अपने अधीन कर लिये थे। यह नेहरू की पहली आत्मघाती गलती थी, उनकी दूसरी आत्मघाती गलती राजा हरि सिंह के भारत में विना शर्त विलय के प्रस्ताव पर देरी से कदम उठाना, उनकी तीसरी आत्मघाती गलती थी भारतीय सेना के हाथ बांध देना , भारतीय सेना कबायलियों की वेश में हमला करने वाली पाकिस्तान की सेना को बहुत आगे तक खदेड़ दी थी, चार-पांच दिन का और भारतीय सेना को समय दे दिया होता तो फिर भारतीय सेना गुलाम कश्मीर, गिलगित और ब्लास्टीन को भी आजाद कर लेती, चैथी आत्मघाती गलती उनकी जम्मू-कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्टसंघ में ले जाना और पांचवी आत्मघाती गलती उनकी कश्मीर को धारा 370 दे देना, छठी आत्मघाती गलती उनकी एक देश दो झंडे की थी, सातवीं आत्मघाती गलती उनकी कश्मीर की यात्रा के लिए भारतीय नागरिकों के लिए परमिट -पासपोर्ट व्यवस्था लागू करने की थी। 
                         नेहरू की आत्मघाती गलतियां तो और भी थी पर ये सात प्रमुख गलतियां भारत की संप्रभुत्ता और अंखडता पर भारी पड़ गयी। पाकिस्तान जो चाहता था और जिस तरह से पाकिस्तान का पक्ष मजबूत होता उसी तरह से नेहरू जाने-अनजाने में करते चले गये। इसका दुष्परिणाम राष्ट की संप्रभुत्ता और अंखंडता चुकायी है, आज भी गुलाम कश्मीर, गिलगित और बल्टास्तीन पाकिस्तान के कब्जें में हैं। ऐसी आत्मघाती नीति से कोई भी राष्ट कैसे सबल हो सकता है? यही कारण है कि जम्मू-कश्मीर में राष्टवाद की धारा अत्यंत कमजोर होती चली गयी, राष्ट की अस्मिता हर समय कुचली गयी। इतना ही नहीं बल्कि पाकिस्तान परस्ती बढ़ती चली गयी, जम्मू-कश्मीर को मजहबी स्वरूप देने की कोशिशें लगातार जारी रही।
                      जम्मू-कश्मीर में राष्अवाद की स्थापना के लिए, एक देश और एक कानून तथा एक झेंडे, परमिट-पासपोर्ट सिस्टम समाप्त करने की एक लंबी लड़ाई लड़ी गयी और देश ने इस लड़ाई में जो बलिदान किया है वह बेमिसाल हैे। जनसंघ के संस्थापक और महान देश भक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान हमंें याद करना होगा। सबसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक देश, दो झंडे का विरोध किया था और जम्मू-कश्मीर की यात्रा के लिए भारतीय नागरिकों के लिए जरूरी बना दी गयी परमिट- पासपोर्ट सिस्टम का विरोध किया था और इसके खिलाफ आंदोलन किया था। उस समय जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुला के बीच गोलबंदी थी ये दोनों की गोलबंदी देश की संप्रभुत्ता और एकता के खिलाफ थी। 
                          यह अपमानजनक बात ही थी कि देश को नागरिकों को ही अपने देश के अंदर में जाने के लिए  परमिट-पासपोर्ट सिस्टम से गुजरने के लिए बाध्य होना पडता था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने परमिट-पासपोर्ट सिस्टम के खिलाफ आंदोलन किया । परमिट -पासपोर्ट सिस्टम को तोड़ा। जम्मू-कश्मीर की शेख अब्दुला सरकार ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। जेल में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हत्या होती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हत्या में जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुला की मिली भगत थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान ने देश को झकझोर कर रख दिया, जवाहरलाल नेहरू की सरकार हिल गयी थी, कांग्रेस की जमीन खिसक गयी थी। जवाहरलाल नेहरू को हार कर कश्मीर यात्रा के लिए लागू परमिट-पासपोर्ट सिस्टम को वापस लेना पड़ा। इस प्रकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान राष्ट के लिए प्रेरणा का काम किया। कश्मीर में राष्टवाद की स्थापना का यह पहला चरण था।
                    कश्मीर के अंदर में राष्टवाद की स्थापना और विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा घारा 370 थी। धारा 370 को आधार बना कर राष्टविरोधी लोग कहते थे कि हम भारत से अलग हैं, हमें विशेष छूट मिली हुई है और भारत का संविधान पूरी तरह से हमारे उपर लागू ही नही होते हैं। धारा 370 कोई स्थायी नहीं थी, यह अस्थायी थी। जवाहरलाल नेहरू ने इस धारा को लागू करने के समय कहा था कि कुछ दिनों के बाद यह धारा हटा ली जायेगी। पर यह धारा कभी नहीं हटी। कांग्रेस सहित विपक्ष की थोड़ी समय वाली सरकारें भी हिम्मत नहीं दिखा पायी। कांग्रेस तो धारा 370 की जड़ थी। ऐसे में कांग्रेसियों से धारा 370 को हटाने की उम्मीद नहीं थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि कांग्रेसी तो धारा 370 को बनाये रखने के लिए तत्पर रहती थी और कहती थी कि धारा 370 समाप्त कर दी जायेगी तो फिर कश्मीर को अपने साथ रखना मुश्किल हो जायेगा। कांग्रेस पाकिस्तान और दुनिया के 60 मुस्लिम देशों का डर देश को दिखाती थी।
                        नरेन्द्र मोदी ने साहस दिखाया, महान कार्य किया। अपने वायदे के अनुसार धारा 370 हटायी। धारा 370 का हटना देश के लिए सबसे बडी उपलब्धि रही है। धारा 370 के हटने के साथ ही साथ कश्मीर में राष्टविरोधी तत्वों पर बज्रपात हो गया, उनकी पाकिस्तान परस्ती पर बुलडोजर चल गया। सबसे बड़ी बात यह है कि कश्मीर के अंदर में पूर्ण राष्टवाद के स्थापना का मार्ग खुल गया। पाकिस्तान ने जिस तरह कश्मीर के अंदर में मजहबी आतंकवाद और आतंकवादी पाल कर रखे थे उसके कारण कश्मीर में बिना कठोर नीति लागू किये राष्टवाद की स्थापना हो नहीं सकती थी। 
                                 धारा 370 समाप्त होने के बाद कश्मीर में किस प्रकार से आतंकवाद और आतंकवाद की भाषा पर अंकुश लगा है और उन्हें भारतीय कानून का पाठ पढ़ाया गया है यह भी जगजाहिर है। जब धारा 370 लागू करने की जब कोशिश हो रही थी तब महबूबा मुफती सईद, फारूख अब्दुला और उमर अब्दुला ने कैसी राष्टविरोधी भाषा बोली थी, पाकिस्तान पोषित आतंवकादी संगठन कैसी धमकिया पिला रहे थे और पाकिस्तान किस प्रकार से भारत को डरा-धमका रहा था यह सब भी जगजाहिर है। महबूबा मुुफती सईद, फारूख अब्दुला और उमर अब्दुला सीधे तौर पर पाकिस्तान की भाषा बोल रहे थे, सरेआम पाकिस्तान परस्ती दिखा रहे थे। इन तीनो का कहना था कि अगर कश्मीर से धारा 370 हटायी गयी तो फिर कश्मीर में लासें बिछ जायेगी, भारतीय सेना का नामोनिशान मिट जायेगा। सबसे रक्तरंजित बातें तो भारतीय तिरंगे झंडे को लेकर कही गयी थी उस तिरंगे झंडे को अपमानित किया गया था जिस तिरंगे झंडे की शान के लिए लाखों भारतीयों ने बलिदान किया था। तब ये तीनों देशद्रोही नेताओं ने कहा था कि कश्मीर में तिरंगे को कंधा देना वाला भी नहीं मिलेगा। 
                  नरेन्द्र मोदी ने ये तीनों नेताओं को राष्टवाद का कैसा पाठ पढाया है यह सब जगजाहिर ही है। राष्टविरोधी सईद, फारूख अब्दुला और उमर अब्दुला सहित सभी राष्टविरोधी तत्वों को जेल में डाल दिया गया।विरोध में कहीं कोई जनसैलाब नहीं हुआ। भारतीय सेना और कश्मीर की पुलिस राष्टविरोधी तत्वों से निपटने में वीरता दिखायी है वह प्रेरणादायी है। 
                    धारा 370 समाप्त करने के साथ ही साथ अलग लद्दाख काउसिल का गठन करना भी सराहनीय कार्य है। लद्दाख की बौद्ध जनता प्रारंभ से ही राष्टभक्त रही है और यह बौद्ध जनता बहुत बड़ा बलिदानी भी रही है। जब-जब आतंकवाद सिर उठाता है तब तब हमारी सेना वीरता दिखाती है। हिजबुल मुजहिदीन के शीर्ष कंमाडर रियाज नाइकु का मारा जाना एक बड़ी घटना है। इससे आतंकवाद की कमर टूट गयी है। भारतीय सेना ने यह संदेश दे दिया है कि जो आतंकवादी और राष्टविरोधी तत्व सिर उठायेगा, उसके सिर को काट दिया जायेगा और उसका हस्र भी रियाज नाइकू की तरह ही होगा। रियाज नाइकु पर 12 लाख का ईनाम घोषित था और वह एक तरह से रक्तपिशाचु था। 
सबसे बडी बात यह है कि पाकिस्तान पोषित आतंकवाद अब श्रीनगर के आसपास के पांच जिलों तक ही सीमित है। पूरे कश्मीर में आतंकवाद नहीं है।
                              कश्मीर की जनता यह समझ ली है कि आतंकवाद से उनका भला नहीं होने वाला है। आतंकवाद से सिर्फ उनका ही नुकसान होगा, उनका ही विकास रूकेगा। पाकिस्तान उसके लिए भस्मासुर के सम्मान है। इसलिए कश्मीर की जनता अब भारत के अभिन्न अंग के रूप में सामने आ रही हैं। मतदान में हिसा ले रही हैं। कश्मीर ही नहीं बल्कि जम्मू और लद्दाख में भी पंचायत चुनाव हुए हैं। पंचायत चुनावों में कश्मीर की जनता ने उत्साह के साथ शामिल हुए हें। जबकि रियाज नाइकु जैसे आतंकवादियों ने वोट करने पर आंखों में तेजाब डालने की धमकी दी थी। आज पंचायत मुख्यालयों पर तिरंगा झंडा लहरा रहा है। सभी सरकारी भवनों पर तिरंगा झंडा लहरा रहा है।
                   नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कश्मीर की जनता के विकास के लिए अपनी तिजोरी खोल दी है और यह समझाने में कामयाब हुई कि राष्टवाद में सक्रिय रहने से ही उनका विकास संभव है। आज कश्मीर विकास के रास्ते पर अडिग और सक्रिय है। विकास के रास्ते में रोडा बने सभी कानूनों को हटा दिया गया है। हम यह कह सकते हैं कि कश्मीर में अब राष्टवाद मजबूत हो रहा है और आतंकवाद की रीढ टूट चुकी है।