कोरोना :: अभिशाप या वरदान
May 15, 2020 • गोपाल मोहन मिश्र

(गोपाल मोहन मिश्र)

कोई कह रहा है कि कोरोना की उँगली दुनिया के फैक्ट्री रीसेट बटन पर पड़ गई है। उसके हल्के शुरूआती दबाव ने एक जबरदस्त आवर्ती आलोड़न पैदा कर दिया है, इसलिए हम समय एक हिंडोले में बैठे हिल रहे हैं और वक्त का पेंडुलम हमें अपनी दोलन.गति से एक साथ अतीत, वर्तमान और भविष्य का नज़ारा दिखा रहा है।इससे हमारी गलत.सलत समझ के पीले पड़ चुके पन्ने खुद उड़कर पृथ्वी के बाहर गिर रहे हैं।यूँ समझिए कि कोविड.19 हमारे ढेरों अनचाहे ऐप्स को अनइंस्टाल करके हमारे स्मार्ट फोन को री.स्टार्ट कर रहा है।इसमें थोड़ा समय तो लगेगा ही। सभ्यता के रीसेट टाइम में कोरोना की टिक्.टिक् !!! इस कोरोना समय की घड़ी का घंटा कुछ अलग है।24 मार्च से लॉकडाउन ही एक नया क्लॉक है प् इसकी टिक्.टिक् पर हमें ग़ौर करना ही होगा । यह समय चीन के वुहान से शुरू होता है और इटली, ईरान, फ्रांस, स्पेन, सिंगापुर, इंग्लैंड,अमेरिका और  भारत होते हुए पृथ्वी के 204 देशों का समय बनने लगता है। विज्ञान प्रौद्योगिकी की उपलब्धियों से एक भ्रम ये पैदा हुआ कि समय एवं दूरी हमारी मुट्ठी की गिरफ्त में आ गए हैं । मार्को पोलो, वास्को डि गामा, कोलंबस, फर्डिनेंड मैजलेन, जेम्स कुक द्वारा खोजी 7 महाद्वीपों तथा 5 महासमुद्रों वाली एक बहुत विस्तृत दुनिया बहुत छोटी होकर एक विश्वग्राम बन गई है।इस प्रकार शायद आपसी सहयोग एवं अंतरावलंबन की डोर से बँधी एक संवेदना.वैश्वीकरण को रेखांकित कर पाए  लेकिन स्वार्थ और ताकत की मंशा जल्दी सामने आने लगी और वैश्विकता को किनारे छोड़कर स्थानीयता फिर राष्ट्रों की प्राथमिक जरूरत बनने लगी।ऐसे में भूमंडलीकरण ने पृथ्वी, पर्यावरण, जीवन, जीवजगत, नदी, पहाड़, जंगल सबका बुरी तरह दोहन किया और जब खतरे का निशान उभरना शुरू हुआ तो दोषारोपण और दायित्व को बहाने से नेशनलिज़्म बनाया जाने लगा । पर्यावरण की तरह कोरोना भी एक वैश्वीकृत उत्पाद की तरह है।

कोरोना पर कुछ दार्शनिक नज़रिए से भी देखा गया है। पहली बात तो ये कि कोरोना ने सर्वशक्तिमान होते जा रहे मनुष्य को एक आईना भी दिखाया है,जिसे थोड़ा गहराई में समझने की जरूरत है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अब तक की जानकारी एवं शोध के आधार पर मनुष्य सबसे बुद्धिमान एवं जटिल प्राणी है । जब वह अपनी सहज बुद्धि से और चेतना के सामान्य स्तर से किसी वैश्विक चुनौती को देखता है,तो उसकी बुद्धि उसे परमाणु हथियारए आतंकवादी हमला और अब तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी कभी.कभी एक विश्वव्यापी चुनौती के रूप में पेश करने लगती है ! विचारक यह मानने लगे हैं कि कहीं धरती पर किसी सुपर बुद्धि का विस्फोट न घटित हो और वह मानवीय सभ्यता को ओवरटेक न कर ले। ख़ैर कोरोना वाइरस के मामले में ऐसा नहीं है। कोरोना एक नॉन ह्युमन, नॉन .लिविंग, नॉन  इंटेलिजेंटश अनकांशस सिंपल वाइरसश  है जो बिना किसी योजना के अपनी निर्मित प्रतिलिपि को बार.बार दोहराता रहता है ।लेकिन यह मनुष्य की विशाल सभ्यता को चुनौती देने की क़ुवत रखता है। इस प्रकार कोरोना  संकट का एक भाष्य है तो यह बहुत स्पष्ट है कि हमारी सभ्यता अनेक नॉन ह्युमन भौतिक, रासायनिक, जैविक पारिस्थितकीय प्रक्रियाओं पर निर्भर है,जो खुद में बहुत सरल, बहुत सहज एवं बहुत अचेतन होती है लेकिन उनमें से किसी में हुआ थोड़ा सा भी उत्परिवर्तन, परिवर्तन या किसी प्रकार का बदलाव मनुष्य की सभ्यता के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। आप देख सकते हैं कि आज किस प्रकार पूरा का पूरा समाज घरों के अंदर कैद है जिसे सेल्फ.आइसोलेशन कहते हैं। इसे दार्शनिक तरीके से नॉन ह्युमनश यथार्थ के भीतर छिपा अमानवीय यथार्थ कहा जा सकता है ।

कोरोना वाइरस संकट पर 91 वर्षीय दार्शनिक नोम चॉमस्की का कहना है कि विश्व.भर में इससे बचाव के लिए पहले से ही इलाज ढूँढ़ने में कोताही हुई है,क्योंकि इसकी आशंका 15 साल पहले सार्स महामारी के समय ही हो गई थी। उन्होंने कहा है कि बड़ी.बड़ी प्राइवेट दवा कंपनियों को नए.नए प्रकार के बॉडी क्रीम बनाने में मुनाफा नज़र आता है, वे वैक्सीन बनाने में क्यों दिलचस्पी लेंगी। चॉमस्की को आशा है कि दुनिया कोविड.19 की विभीषिका को तो पार कर जाएगी लेकिन उनकी चिंता मानवीय इतिहास की इससे भी ज्यादा दो भयंकर बर्बादियों की आशंका को लेकर है, न्यूक्लियर वार एवं ग्लोबल वार्मिंग ।उनका भी मानना है कि कोरोना वाइरस हमें यह सोचने पर विवश करेगा कि आगे किस प्रकार की दुनिया हम चाहते हैं ।