कृषि प्रधान देश में भुखमरी
October 19, 2019 • देवानंद राय
(देवानंद राय)
जिस देश में द्वार पर आए किसी व्यक्ति को भूखा लौटा देना पाप माना जाता है जहां पर अतिथि को भरपेट भोजन कराना पुण्य माना जाता हो जहां कबीर की सूक्ति "साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय मैं भी भूखा ना रहूं साधु भूखा ना जाए" रची बसी हो वह देश ग्लोबल हंगर इंडेक्स में गंभीर स्थिति में आ जाए तो हैरानी होती है कहीं ना कहीं हम विकास के नाम पर भारत और इंडिया दो देश एक ही देश में तो नहीं बना रहे बढ़ती गरीबी बेरोजगारी और भुखमरी इंडिया और भारत के बीच की खाई को बढ़ाता है जा रहा है सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित कराने के बाद भी अगर इस तरफ हम भी चलते जा रहे हैं तो यह कहीं न कहीं हमारे नीतियों और उनके क्रियान्वयन में हो रही कमी को दर्शाता है एक तरफ हम 5 ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना देख रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर देश में कई बिलियन लोग भूखे रह रहे हैं यह दोनों सपनों में एक बड़ा विरोधाभास है हाल ही में जारी हुए वैश्विक भुखमरी सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स जी एच आई) 2019 में भारत कुल 117 देशों में 102 स्थान पर है यह सर्वे आयरलैंड की एजेंसी कंसर्न वर्ल्ड वाइड और जर्मनी के संगठन वेल्ट हंगर हील्फे द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया रिपोर्ट में भारत के भुखमरी स्तर को गंभीर कहा गया है ग्लोबल हंगर इंडेक्स की गणना चार आधारों पर की जाती है जिनमें अल्प पोषण बच्चों के कद के हिसाब से कम वजन बच्चों का वजन कद के हिसाब से कम होना और बाल मृत्यु दर इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में कद के हिसाब से कम वजन होने का प्रतिशत 2008-2012 में 16.5% से बढ़कर 2014 से दो हजार अट्ठारह में 20.8% हो गया जो इस सर्वे में शामिल सभी देशों में से अधिक है रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 6 महीने से 23 महीने के सभी बच्चों में से मात्र 9.6% बच्चे को न्यूनतम स्वीकार्य आहार दिया गया है ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत के पड़ोसियों की स्थिति भारत से बेहतर है सूची में नेपाल 77और पाकिस्तान 94 तथा श्रीलंका 66 और बांग्लादेश 88वें स्थान पर है यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र बाल कोष) की हाल की रिपोर्ट भारत के बारे में कहती है कि भारत में हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है तो वहीं अपने देश में ही हर वर्ष एक लाख 40 करोड़ रुपए का नाच बर्बाद हो जाता है यानी देश का 40% वार्षिक उत्पादन में बर्बाद हो जाता है यानी एक तरफ हम अपने को बर्बाद कर रहे हैं और साथ ही अपने बच्चों के स्वास्थ्य को भी कुछ ऐसी ही स्थिति पूरे विश्व की है संयुक्त राष्ट्र की ओर से हाल ही में पेश हुए पोषण संबंधी रिपोर्ट में कहा गया कि पूरे विश्व में 5 साल से कम उम्र के लगभग 70 करोड़ बच्चों में से एक तिहाई बच्चे कुपोषित हैं या फिर मोटापे से पीड़ित हैं हम आने वाले समय में विश्व गुरु बनना चाहते हैं पर एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में भुखमरी की स्थिति पर पहुंचना चिंताजनक है देश की छवि को सुधारने में बाधक है ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2014 में 55 स्थान पर थे फिर 2015 में पहुंचे 80 पर पहुंचे 2016 में 97, 2017 में 100 और अब 2019 में 102 वेंं स्थान पर हैं यह भूखमरी का आंकड़ा है तो वही हम गेहूं चावल दाल के उत्पादन में विश्व के शीर्ष देशों में से हैं दूध उत्पादन में हम शिखर पर हैं गेहूं उत्पादन में हम विश्व में अमेरिका जी के बाद तीसरे स्थान पर काबिज हैं तो वहीं चावल उत्पादन में चील के बाद हमारा ही नंबर है फिर भी पूरे विश्व की 25% आबादी जहां रहती हो वहां की 28% आबादी गरीबी में है और कभी-कभार दाने-दाने को मोहताज होते हैं तो कभी एक वक्त का भोजन पाते हैं यह विरोधाभास बड़ा ही दुखदाई है एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 40% कुपोषित बच्चे भारत में ही हैं भारत के प्रति वर्ष 25 लाख बच्चों की जान पोषण के अभाव में चली जाती है अब इन सब का कारण क्या है ? क्या सरकार कुछ नहीं कर रही ? क्या सरकारी कार्यक्रम सहायक सिद्ध नहीं हो रहे ? यह सवाल जरूर दिमाग में आ रहे होंगे सरकार और सरकारी कार्यक्रम सब कुछ कर रही है पर वह धरातल पर कम कागजों में ज्यादा बच्चों को पोषित कर रही है गोदामों में करोड़ों टन अनाज सड़ रहा है किसी को कोई फिक्र नहीं है सरकार को न सरकार चलाने वालों को सरकार का आदेश पालन करने वालों को इसी तरह हम सिर्फ नीतियां बना रहे हैं पर उनके फूल और सफल क्रियान्वयन में विफल होते जा रहे हैं जिसके फलस्वरूप हम अर्थव्यवस्था को तो खूब चमका रहे हैं प्रदेश में गरीबों को पोषित बच्चों के लिए होने वाले व्यवस्थाओं को भूलते जा रहे हैं हमें इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस एकीकृत बाल विकास सेवाएं जो सीधे तौर पर बच्चों के पोषण से जुड़ी पब्लिक डिलीवरी सिस्टम सार्वजनिक वितरण प्रणाली जो गरीबों के भोजन से जुड़ी हैं मनरेगा जो गरीबों के आजीविका से जुड़ी स्तर पर काम करना होगा आईसीडीएस के द्वारा हम बच्चों को पोषित कर उन्हें कुपोषण से बाहर लाएंगे पीडीएस द्वारा गरीब परिवारों को अनाज उपलब्ध कराएंगे जैसे कि विश्व के हर भाग में एक ही कहानी है कि कुपोषण का सीधा संबंध गरीबी से है और गरीबी का संबंध बेरोजगारी से है तो हमें इन सभी विषयों पर ठोस कदम उठाने होंगे हम इनमें से किसी एक विषय को छोड़ नहीं सकते क्योंकि यह सभी एक दूसरे से इस तरह से जुड़े हैं कि किसी एक का संतुलन दूसरे के लिए दिक्कत खड़ा कर देता है वर्तमान में भारत भुखमरी ही नहीं अन्य के बर्बादी से भी जूझ रहा है कहा जाता है कि हवा पानी की तरह भोजन भी मानव का बुनियादी अधिकार है लेकिन विडंबना देखिए आज भी ना सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व में करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं ऐसा नहीं है कि भारत में खाद्यान्न की कमी है भारत जितनी आबादी है उसके दोगुना खाद्यान्न उत्पन्न करता है परंतु इनमें से काफी बर्बाद हो जाता है भोजन सिर्फ फेंकने की समस्या ही नहीं है बल्कि संतुलित आहार देने की बड़ी समस्या अब धीरे-धीरे सामने आ रही है सबसे अधिक भोजन शादी ब्याह में बर्बाद होता है भोजन से पेट भर सकता है पर वह भोजन बच्चों को कुपोषण से बाहर नहीं ला सकता क्योंकि उनमें पोषक पदार्थों की मात्रा कम होती है और कैलोरी की मात्रा अधिक होती है इस कारण हाल ही में पेश हुए यूनाइटेड नेशन की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पूरे विश्व में 5 साल से कम उम्र के लगभग 70 बच्चे कुपोषित हैं या मोटापे के शिकार हैं मोटा होना अब स्वास्थ्य की निशानी नहीं रहा संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि हम खानपान की लड़ाई हार रहे हैं क्योंकि अब एक नई समस्या खड़ी हो रही है कि एक और जहां हम विश्व के करोड़ों बच्चों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है तो वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चों में असंतुलित खान-पान के कारण कम उम्र में मोटापा के शिकार हो रहे हैं दोनों ही स्थिति में कुपोषण से पीड़ित हो रहे हैं हमारा देश कृषि प्रधान देश है फिर भी यहां किसान सबसे गरीब है हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भर देश है लेकिन हमारे देश में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या चीन से अधिक है कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट कहती है कि जितना खाना हम एक साल में बर्बाद करते हैं उतना दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था ब्रिटेन उगा भी नहीं पाता भोजन के पैसे बर्बाद होने वाले पैसे को बचाकर करोड़ों बच्चों को कुपोषण मुक्त बना सकते हैं आइए हम सब मिलकर कोशिश करें कि हमारे आस पास कोई भूखा ना रहे और जो बच्चे कुपोषित हैं उन्हें जरूरी सरकारी सहायता उपलब्ध कराएं सरकार के ठोस कदमों से तथा सार्वजनिक रूप से सरकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन और व्यक्तिगत पहल से ही हम अपने भारत के भावी भविष्य को पोषण मुक्त करा सकेंगे सकेंगे