मजदूर बने सरकारी बोझ
May 14, 2020 • हर्ष शर्मा

(हर्ष शर्मा)

किसी भी उद्योग की उन्नति, या विकास होता है तो सही मायने में उस उन्नति का असली हकदार वह मजदूर ही होता है जो पूरे समय काम करके उस उद्योग में अपना योगदान करता है। चूँकि अधिकतर मजदूर देश में गरीब होता है तो आप समझ ही सकते है की गरीब की अवस्था हमारे देश में वैसी ही है जैसे मधुमक्खी और शहद की। जिस प्रकार मधुमकखियों के छत्ते से शहद निकाल कर लोग शहद का सेवन करते है और आनंद लेते है परन्तु उस मेहनत को याद नहीं करते जो मधुमकखियों ने उसे एकत्रित करने में की है ठीक वही अवस्था हमारे देश में मजदूरों की है।
भारत के विभिन्न राज्यों में श्रमिक कानून को लेकर जो किया जा रहा है वह असहनीय है।
जैसा कि अर्थव्यवस्था लॉकडाउन के साथ संघर्ष कर रही है और हजारों फर्मों और श्रमिकों को अनिश्चित भविष्य में सामना भी करना पड़ सकता है, पिछले हफ्ते कुछ राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों के आवेदन में महत्वपूर्ण बदलाव करने का फैसला किया है। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों की घोषणा तीन भाजपा शासित राज्यों - यूपी, एमपी और गुजरात द्वारा की गई थी, लेकिन कई अन्य राज्यों, कांग्रेस (राजस्थान और पंजाब) के साथ-साथ बीजेडी शासित ओडिशा ने भी कुछ बदलाव किए थे, हालांकि छोटे दायरे में । सबसे अधिक आबादी वाले राज्य यूपी ने सबसे चिंताजनक और बड़ा ही गंभीर बदलाव किया है क्योंकि इसने राज्य के सभी श्रम कानूनों के आवेदन को अगले तीन वर्षों के लिए निलंबित कर दिया है।
इन कानूनों में बदलाव करने से कई मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि फिर सरकारी नियमनुसार कोई भी उद्योग अपने यहां सशर्त ही उसे नौकरी देगा और वह या तो कमाने के लिए स्वीकार करेगा या फिर अस्वीकार करेगा और समाज में श्रमिकों के भीतर तनाव पैदा होगा।
इसी बीच 10 श्रमिक संघ ने मिलकर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन में इस बात को रखने की कोशिश कि है, संगठन ने आईएलओ अधिवेशन (87,98, 144) के तहत मामला दर्ज कराने की कोशिश में है, उनका मानना है कि अचानक से किए गए श्रमिक कानूनों में बदलाव उनके स्वतंत्रता के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार, और मर्यादाओं का हनन है।
कोई भी श्रमिक हर उद्योग का एक अहम हिस्सा होता है, हर श्रमिक अपने स्तर और योग्यता अनुसार अपना योगदान करता है और उद्योग उन्नति करता है और अगर उनका ही ख्याल ठीक तरह नहीं रखा जाएगा तो भारत के भविष्य के लिए यह सही संकेत नहीं है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इन मजदूरों तक ठीक तरह से सूचना भी नहीं पहुंचाई गई है कि ऐसा भी कुछ किया जा रहा है, ज्यादातर श्रमिक जो अपना घर छोड़कर दूसरे दूसरे राज्यो में काम करते थे वह अभी तालाबंदी के कारण फसे हुए है उसमे से बहुतों ने तो पैदल ही यात्रा कई दिनों से आरंभ कर चुके है और कई सरकारी झांसो का शिकार बने बैठे है, और कुछ ने तो रास्ते में ही दम तोड़ दिया। जिस श्रमिकों के बल पर सरकार पांच ट्रिलियन कि अर्थ व्यवस्था की बाते कही जा रही थी आज वही सरकारें इन मजदूरों का बोझ नहीं उठा पा रही है।