पति पत्नी के अनूठे प्यार का पर्व है करवा चौथ
October 17, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

(बाल मुकुन्द ओझा)

पति - पत्नी के अनूठे स्नेह और प्यार के प्रतीक के रूप में करवा चौथ भारत का एक प्रमुख त्योहार है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की सलामती और लम्बी उम्र के लिए उपवास रखती है। करवा चैथ दो शब्दों से मिलाकर बना है। करवा यानी मिट्टी का बर्तन और चौथ यानि चतुर्थी। इस पूजा में मिट्टी के बर्तन करवे का विशेष महत्त्व होता है। करवा चौथ का त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। महिलाओं का सबसे खास पर्व इस साल गुरुवार 17 अक्टूबर को है। एक दिन का यह त्योहार प्रत्येक वर्ष मुख्यतः उत्तरी भारत की विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। चैथ का व्रत कुछ अविवाहित लड़कियों द्वारा भी रखा जाता है अपने मंगेतर की लंबी उम्र के लिए। इस बार उपवास का समय 13 घंटे 56 मिनट का है। वहीं करवा माता की पूजा के लिए 1 घंटे 16 मिनट का ही समय मिलेगा। इस बार करवा चैथ पर विशेष संयोग भी बन रहा है। ज्योतिषियों के अनुसार, करवा चैथ पर इस बार रोहिणी नक्षत्र के साथ 70 साल बाद मार्कंडेय और सत्यभामा योग बन रहा है। यह योग बहुत ही मंगलकारी है। गुरुवार, 17 अक्तूबर को सुबह 6.48 बजे चतुर्थी शुरू होगी  जो अगली सुबह 7.29 तक रहेगी। पूजा का मुहूर्त शाम 5 बजकर 50 मिनिट से 7 बजकर 6 मिनिट तक होगा। चांद शाम को आठ बजकर अठारह मिनिट पर निकलेगा। 
इस दिन महिलाएं रात को चांद देखकर उसे अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। इस व्रत की शुरुआत सावित्री के त्याग और फल से हुई थी।  पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री अन्न जल त्याग कर यमराज से अपने पति को वापस लाई थी। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है। यह व्रत अच्छे गृहस्थ जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। सोलह श्रृंगार में माथे पर लंबी सिंदूर अवश्य हो क्योंकि यह पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। मंगलसूत्र, मांग टीका, बिंदिया ,काजल, नथनी, कर्णफूल, मेहंदी, कंगन, लाल रंग की चुनरी, बिछिया, पायल, कमरबंद, अंगूठी, बाजूबंद और गजरा ये 16 श्रृंगार में आते हैं। इस दिन सुहागिन स्त्रियां निर्जल व्रत कर चौथ माता से अपने पति की लम्बी उम्र की कामना करती है।  
इस व्रत को उत्तर भारत में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। व्रत में चौथ माता के पूजन का महत्व सर्वाधिक है। इस दिन महिलाएं सजी थाली से पूजा करना शुभ मानती हैं। करवा चौथ के व्रत में चैथ माता की पूजा करना जरूरी होता है। थाली में सिंदूर, रोली, जल और सूखे मेवे रखते हैं। करवा चैथ के व्रत और पूजा में इस थाली का खासा महत्व होता है। इसलिए कुछ महिलाएं खुद भी ये थाली सजाती हैं। करवा चैथ पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा होती है। इस पूजा में शाम को सभी व्रती महिलाएं एक साथ बैठकर व्रत कथा कहती हैं। सबसे पहले चैथ माता की स्थापित मूर्ती पर फूल-माला और कलावा चढाया जाता है और उनके प्रतिमा के आगे करवा में जल भर कर रखा जाता है। 
करवा चौथ के दिन चंद्रमा उदय होने का समय सभी महिलाओं के लिए बहुत महत्व का है क्योंकि वे अपने पति की लम्बी उम्र के लिये पूरे दिन (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। वे केवल उगते हुये पूरे चाँद को देखने के बाद ही पानी पीती हैं। यह माना जाता है कि चाँद देखे बिना व्रत अधूरा है। इस दिन  महिला न कुछ  खा सकती हैं और न पानी पी सकती हैं।  इस दिन महिलाएं शिव, पावर्ती और कार्तिक की पूजा-अर्चना करती हैं  फिर शाम को छलनी से चंद्रमा और पति को देखते हुए पूजा करती हैं। पूजा के समय ही करवा चौथ की कथा सुनी जाती है. चन्द्रमा को छलनी से देखा जाना चाहिए। फिर अंत में पति के हाथों से जल पीकर व्रत समाप्त हो जाता है अंत में चांद का दीदार करने के बाद महिलाएं पति के हाथों पानी पीकर अपना व्रत तोड़ती हैं. यह  माना जाता है कि अगर छलनी में चंद्रमा देखते हुए पति की शक्ल देखना शुभ माना जाता है।