स्कूली छात्रों पर मंडराया डायबिटीज का खतरा
October 12, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

(बाल मुकुन्द ओझा)

बदहाल स्कूली शिक्षा को सुधारने के व्यापक प्रयासों के बीच अब छात्र एक ऐसी बीमारी में फंसने जा रहे है जो देखने में तो साधारण दिखाई देती है मगर है बड़ी भयावह। इस खतरनाक बीमारी का नाम है डायबिटीज। जिसे अब सभी लोग पहचानने लगे है। इस बीमारी के लोगों की अस्पतालों में लम्बी कतारें देखी जाने लगी है और इसने अन्य बीमारियों को पीछे छोड़ सभी आयु वर्ग के लोगों को सामान रूप से डसना शुरू कर दिया है। भारत में तेजी से पांव पसार रहे डायबिटीज ने बच्चे से बुजुर्ग तक किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को अपनी चपेट में लेने से नहीं छोड़ा है। अमीर हो या गरीब अथवा किसी भी जातिवर्ग का व्यक्ति हो ,सब सामान रूप से इस बीमारी में फंसते जा रहे है। 
स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से हाल ही में जारी पहले व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वे ने यह खुलासा कर सबको चैंका दिया है कि स्कूल जाने वाले हर दस में से एक भारतीय बच्चे पर डायबिटीज का खतरा मंडरा रहा है। प्री-डायबिटिक चरण में चल रहे इन बच्चों का ब्लड शुगर 100 से 126 मिलीग्राम के बीच दर्ज किया गया है। साल 2016 से 2018 के बीच के आंकड़ों पर आधारित इस सर्वे में सबसे ज्यादा 22 फीसदी प्री-डायबिटिक बच्चे मणिपुर में मिले। पश्चिम बंगाल ऐसे बच्चों की संख्या 21.7 फीसदी तो गुजरात में 20.8 प्रतिशत दर्ज की गई। वहीं, गोवा में ऐसे बच्चे सबसे कम संख्या (1.8 फीसदी) में पाए गए, जिनके आगे चलकर डायबिटीज का शिकार होने की आशंका है। अन्य क्षेत्रों में अक्सर खराब प्रदर्शन करने वाले यूपी-बिहार की स्थिति बेहतर है। यूपी के 4.2 फीसदी तो बिहार के 6.6 फीसदी बच्चे प्री-डायबिटिक चरण में हैं। राष्ट्रीय पोषण सर्वे से यह भी पता चलता है कि शहरों और गांवों में प्री-डायबिटिक बच्चों की संख्या लगभग बराबर है। शहरी क्षेत्रों में जहां 10.9 बच्चे प्री-डायबिटिक हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में ऐसे बच्चें की संख्या 10.2 फीसदी दर्ज की गई है।
देश में पहली बार किए गए राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण ने जो रिपोर्ट जारी की है वह गहन चिंतनीय है। खान पान की जिस प्रकार की जीवन शैली देशवासियों ने विकसित की है  वह बेहद डरावनी है। ध्यान देने की बात यह भी है की संपन्न और शिक्षित लोग भी बच्चों के पोषण को लेकर सजग नहीं।  सर्वेक्षण का चैंकाने वाला तथ्य यह है कि  दो साल से कम के नौनिहालों  में मात्र 6.4 प्रतिशत  शिशु ही सौभाग्यशाली हैं जिन्हें न्यूनतम स्वीकार्य पोषक आहार मिलता है। गरीब की छोड़ों, संपन्न वर्ग के घरों के बच्चों की पोषण की स्थिति ठीक नहीं है। डायबिटीज ने वैसे ही घर घर में लोगों को अपनी चपेट में ले रखा है और अब नौनिहाल भी इसके शिकार हुए तो भारत को डायबिटीज देश बनने से कोई नहीं रोक पायेगा।
मोदी सरकार चाहती है कि 2022 तक कुपोषण से बच्चों को पूरी तरह छुटकारा दिलाया जाए। मौजूदा रफ्तार से यह संभव नहीं लगता। सबसे बड़ा संकट तो यह है कामकाजी अभिभावक बच्चों को चिप्स, नूडल्स, अन्य फास्ट फूड देंगे तो फिर डायबिटीज जैसी अन्य बीमारियों के प्रभाव से मुक्ति दिलाना संभव नहीं होगा। अमेरिका में हुए एक रिसर्च के अनुसार डायबिटीज के सात नए मामलों में एक मामले के लिए आहार भी जिम्मेदार है। खान पान की वजह से  इस बीमारी के पनपने की आशंका बढ़ जाती है। आहार की आदतों और सुस्त जीवनशैली को इस बीमारी का मुख्य कारक माना जाता है। आंकड़ों की बात करें तो दुनियाभर में फिलहाल 42 करोड़ मधुमेह के रोगी हैं। वर्तमान में भारत में ही 3 करोड़ से ज्यादा डायबिटीज के शिकार लोग हैं। संयुक्त राष्ट्र संगठन यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों का मूल कारण बच्चों को समुचित और संतुलित आहार न देना है।