स्कूली शिक्षा को संगीत फ्रेंडली बनाने की कवायद
October 10, 2019 • बाल मुकुन्द ओझा

(बाल मुकुन्द ओझा)

पठन पाठन को संगीत फ्रेंडली बनाने के लिए सरकार तरह तरह के प्रयोग करने में जुटी है। अब स्कूली बच्चे गीत और संगीत के साथ अपनी पढाई पूरी करेंगे ताकि उनको सकारात्मक और आनंददायक वातावरण मिल सके। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद एनसीईआरटी ने इसके लिए स्कूलों को बाकायदा एक एडवाइजरी जारी कर कहा है लंच ब्रेक या मिड डे मील दिए जाने के दौरान स्कूलों में बच्चों की उम्र के अनुसार गीत संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाये। गाने बजाने के ऐसे कार्यक्रम आवश्यकता के अनुसार पढ़ाई के दौरान भी किये जा सकते है। एनसीईआरटी द्वारा विद्यालयों के कला शिक्षकों के लिये तैयार किये गए 84 पन्नों वाले आर्ट इंटीग्रेटेड लर्निंग दिशानिर्देश में कहा है अध्ययन में पाया गया है कि संगीत से बच्चों की ग्रहणशीलता बेहतर होती है। इससे ठहराव और शांति की भावना भी विकसित होती है। एनसीईआरटी द्वारा ये दिशा-निर्देश एक सफल प्रयोग के बाद तैयार किए गए हैं।
जिस प्रकार हमारा मन और शरीर आत्मा के बिना अधूरा हैं उसी प्रकार जीवन भी संगीत के बिना अधूरा हैं। आजादी के बाद शुरू के चार दशकों में दैनंदिन गतिविधियों के साथ स्कूलों में हर सप्ताह एक दिन छात्र सभा का आयोजन कर गीत संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे जिनमें बड़ी संख्या में छात्र उत्साह के साथ भाग लेते थे। पूरे सप्ताह छात्र उसकी तैयारियां भी करते थे। यहाँ तक की अभिभावक भी घरों में बच्चों को गाने बजाने के काम में सहयोग देते थे। गीत संगीत में गाने बजाने के अलावा लघु एकांकी, भाषण, निबंध, चित्रकला आदि के आयोजन भी होते थे। धीरे धीरे गीत संगीत के ऐसे आनंद देने वाले आयोजन घटते गए। अब सरकार एक बार फिर ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्कूली शिक्षा का बोझिल वातावरण पलटना चाहती है तो इसे स्वागत योग्य कदम कहा जा सकता है।
 निश्चय ही गीत संगीत की शिक्षा को प्रभावशाली व उपयोगी माध्यम बनाकर पढ़ाई का बेहतर माहौल बनाने का यह एक अभिनव प्रयास होगा। सरकार को चाहिए गीत संगीत के माध्यम से बच्चों को समाज में व्याप्त कुप्रथाओं के बारे में भी जानकारी दे और  चित्रकला के माध्यम से बच्चों को जागरूक करने का प्रयास करें। चित्रों के माध्यम से बच्चों को उनकी धरोहर व संस्कृति का ज्ञान दिया जा सकता है। साथ ही उनके अंदर की कला को भी जागृत किया जाये। गीत प्रतियोगिताओं के माध्यम से भी छात्र-छात्राओं में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत की जा सकती है। यह सम्पूर्ण कवायद तभी पूरी होगी जब स्कूलों के पास गीत संगीत की सभी सुविधाएँ यथा कला शिक्षक और विभिन्न वाध यन्त्र आदि उपलब्ध होंगे। देश की स्कूली शिक्षा बदहाली के दौर से गुजर रही है। कोई भी नया प्रयोग करने से पहले स्कूलों की माली हालत सुधारनी जरुरी है।
संगीत मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है जो हमारे कण कण में रचा बसा है। संगीत गायन, वादन व नृत्य का आकर्षक और मनमोहक समावेश है। संगीत हमारा मनोरंजन करने के साथ सुकून भी देता है। जीवन में संगीत का बहुत महत्व है। संगीत से हमारे कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है। संगीत शारीरिक और मानसिक रुप से स्वस्थ रखता है। जीवन में खुश और व्यस्त रहने के लिए संगीत सबसे अच्छा तरीका है। जीवन में संगीत के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों को भी संगीत से अथाह स्नेह है। जब मनुष्य  अकेला महसूस करता है तब संगीत सुन लेता हैं, जब मन दुखी हो तब संगीत सुन लेते हैं, जब किसी की याद आती है तब संगीत सुन लेते हैं। सुख दुःख के हर क्षण में संगीत का अप्रतिम योगदान है। व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने का हौसला भी संगीत प्रदान करता है। जीवन के अंतिम क्षणों में भी हम संगीत का प्रयोग करते है। 
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद भारत सरकार द्वारा स्थापित संस्थान है।  इसका मुख्य कार्य स्कूली शिक्षा के संबंध में सलाह देने और नीति-निर्धारण में मदद करने का है। इसके अतिरिक्त शिक्षा के समूचे क्षेत्र में शोधकार्य को प्रोत्साहित करना, उच्च शिक्षा में प्रशिक्षण सहित स्कूलों में शिक्षा पद्धति में लाए गए बदलाव और विकास को लागू करना है। परिषद के अनुसार जामिया मिलिया इस्लामिया के साथ मिलकर शिक्षकों की एक टीम ने 34 नगर निगम स्कूलों में एक साल के अध्ययन के आधार पर ये निर्देश जारी किए हैं। अध्ययन के बाद तय हुआ की स्कूली बच्चों को गीत संगीत से जोड़ा जाये ताकि पठन और पाठन का कार्य सुचारु और हर्षित माहौल में संचालित किया जा सके। परिषद ने पहली से 8वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए तैयार गाइडलाइन प्रायोगिक तौर पर मध्य प्रदेश के इछावर में शुरू की है जिसके अच्छे और सकारात्मक नतीजे निकले हैं। छात्रों को गीत संगीत से जोड़ने की यह योजना इस माह के अंत तक देशभर में लागू की जाएगी।