विपक्ष के राजनीति बंवडर से भी खतरे मे नहीं है इमरान सरकार
November 6, 2019 • विष्णुगुप्त

(विष्णुगुप्त)

इमरान खान प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए क्यों नहीं बाध्य होंगे? पाकिस्तान की इमरान खान की सरकार के भविष्य को क्यों सुरक्षित माना जा रहा है? इमरान खान की सरकार के खिलाफ विपक्ष का उठा राजनीतिक बवंडर को निरर्थक या फिर लक्ष्यविहीन क्यो माना जा रहा है? विपक्ष के राजनीतिक बंवडर को पाकिस्तान की सेना का साथ क्यों नहीं मिला? क्या पाकिस्तान की राजनीति में अति कट्टरवादी धारा की जमीन तैयार हो रही है? क्या मुख्य विपक्षी दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और नवाज शरीफ की पार्टी की अब सत्ता में लौटने की उम्मीद समाप्त हो गयी है? इमरान सरकार के खिलाफ कट्टरवादी और आतंकवाद के समर्थक मजहबी नेता फजलूर रहमान को इतना समर्थन क्यों मिल रहा है? नवाज शरीफ और विलाल भुट्टों की पार्टी इस मजहबी नेता के पिछलग्गू क्यों बन गयी है? अगर फजलूर रहमान के पक्ष मे कोई राजनीतिक गोलबंदी सुनिश्चित होती है तो फिर पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन मजबूत हो सकते है क्या? इमरान खान की सरकार कायम रखने में पाकिस्तान की सेना की क्या मजबूरी है? पाकिस्तान के अंदर में उठे राजनीतिक बंवडर को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इमरान सरकार की कितनी विश्वसनीयता बची रहेगी? क्या फजलूर रहमान का यह राजनीतिक बवंडर इमरान सरकार की कश्मीर प्रसंग की विफलता का दुष्परिणाम माना जाना चााहिए? पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस राजनीतिक बंवडर से और कितना प्रभावित होगी? अर्थव्यवस्था की कसौटी पर ऐसे राजनीतिक बंवडर का समर्थन करना क्या आत्मघाती कदम नही माना जाना चाहिए? पाकिस्तान के अंदर में अर्थव्यवस्था की कसौटी सर्वोच्च स्थान पर रहती हैं क्या? अगर अर्थव्यवस्था की कसौटी सर्वोच्च स्थान पर रहती तो फिर पाकिस्तान के अंदर में आतंकवाद, कट्टरतावाद, मजहबी हिसा, अल्पसंख्यकों के प्रति उदासीनता की न तो काई नींव होती और न ही कोई ऐसी फसल लहलहाती? क्या यह सही नही है कि आतंकवाद, कट्टरवाद और मजहबी हिंसा जैसी नकारात्मक राजनीति अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं होने देती? फजलूर रहमान के इस राजनीतिक बंवडर से पाकिस्तान की साख एक बार फिर दुनिया के अंदर अविश्वसनीयता का शिकार हुई है, कमजोर हुई है। सुनिश्चित तौर पर पाकिस्तान की वर्तमान अर्थव्यवस्था और भी चैपट होगी?
             फजलूर रहमान का यह राजनीतिक बंवडर कितनी शक्ति निर्मित कर पायी, इमरान खान की सरकार को कितनी डरा पायी? इमरान खान क्या भविष्य में इस्तीफा देने के लिए मजबूर होंगे? ऐसे प्रश्न दुनिया के लिए महत्वपूर्ण होंगे पर पाकिस्तान के लिए ऐसे प्रश्न कोई अर्थ नहीं रखते है? पाकिस्तान का यही इतिहास है कि वहां पर अंधेरगर्दी पंसद की जाती है, अराजकता को समर्थन मिलता है, शक्ति मिलती है। भारत जैसी जनक्रांति पाकिस्तान कें अंदर न तो हो सकती है और भविष्य में भी न होने की उम्मीद हो सकती है। भारत में आजादी के बाद भी कई राजनीतिक जनक्रातियां हुई है, इमरजेंसी के दौरान इन्दिरा गांधी जैसी तानाशाही राजनीतिज्ञ का पतन जनक्रांति से हुई थी, अराजक और  भ्रष्ट सरकारें वोट की जनक्रांति से जमींदोज होती रही हैं। पर पाकिस्तान में एक भी ऐसी क्रांति नहीं हुई है और वोट क्रांति पर भी पाकिस्तान की सेना का पहरा रहा है, पाकिस्तान की सेना जिधर चाहती है उधर वोट की क्रांति का मुंह मोड देती है। यह भी सही है कि आंदोलन तभी कोई सफल होता है जब उस आंदोलन का व्यापक समर्थन हासिल होता है और आंदोलन कर्ता का जनाधार व्यापक होता है। अब यहां यह भी देखना होगा कि इमरान खान को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से आंदोलन कर रही फजलूर रहमान की पार्टी का समर्थन और जनाधार व्यापक है या नहीं, इस पार्टी का जनाधार दो प्रमुख प्रदेशों और प्रमुख सत्ता के केन्द्र में खडी जातियों में है या नहीं? उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के अंदर कई जातीय और कई क्षेत्रो की अस्मिताएं राजनीति को नियंत्रित करती रही हैं। इनमे से दो प्रमुख जातीय और क्षेत्रीय अस्मिताएं हैं जो पाकिस्तान की सत्ता पर राज करती रही हैं और जिनका पाकिस्तान के सभी क्षेत्रों पर पकड मजबूत हैं। ये दोनों अस्मिताओं के नाम पंजाबी और सिंधी अस्मिताएं हैं। पंजाबी अस्मिाओं का प्रतिनिधित्व नवाज शरीफ करते हैं और उनकी पार्टी करती है जबकि सिंघी अस्मिता का प्रतिनिधित्व भुट्टों परिवार करता है। भुट्टों परिवार का प्रतिनिधित्व अभी विलाल भुट्टों कर रहे हैं जो पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों के बेटे हैं। फजलूर रहमान न तो पंजाबी मूल का प्रतिनिधित्व करते है और न ही फजलूर रहमान सिंघी मूल का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उपर्युक्त तथ्यों के अवलोकन से साफ होता है कि पूरे पाकिस्तान में न तो फजलूर रहमान का कोई खास वजूद है और न ही पूरे पाकिस्तान से उसे व्यापक समर्थन हासिल हो रहा है। अगर ऐसा  है तो फिर फजलूर रहमान का आंदोलन भी कोई लक्ष्य कैसे प्राप्त कर सकता है?
  पाकिस्तान की सेना की सर्वोपरीयता को अभी तक किसी ने चुनौती देने का सरेआम साहस नहीं किया है, उडने के लिए जो राजनीतिक पंख फडफडाये वह राजनीतिक पंख उडान भरने के पूर्व ही काट डाले गये। पाकिस्तान के राजनीतिक शासक फंासी के फंदों पर टांग दिये गये, सेना की जेलो में डाल कर सडा दिये गये। नवाज शरीफ ने सेना के खिलाफ अपने पंख फडफडाने की कोशिश की थी। दुष्परिणाम क्या निकला, यह देख लीजिये। पाकिस्तान की सेना ने अपनी बर्वरता और संहारक प्रवृति को हथियार बना कर न्यायपालिका को अपने चंगुल में ले लिया। न्यायपालिका ने नवाज शरीफ सहित बहुत सारे राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार का दोषी ठहरा कर जेलों में डाल दिया और इनसबों की छवि बिगाड डाली। आज नवाज शरीफ जेल में मिले उत्पीडन के कारण जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। जब नवाज शरीफ और आसिफ जरदारी-बिलाल भुट्टो सहित लगभग सभी नेता चुनाव लडने से अयोग्य हो गये, जनता के बीच इनकी छवि खराब कर दी गयी तो फिर पाकिस्तान की जनता के बीच विकल्प ही क्या था? ऐसी परिस्थितियों मेें पाकिस्तान की सेना की कोख से इमरान खान जैसे गैर राजनीतिक किस्म के शासक का जन्म होता है और इमरान खान सेना के मोहरा के तौर पर पाकिस्तान की सत्ता पर कायम हो जाते हैं।
  इमरान खान निश्चित तौर पर पाकिस्तान की सेना का मोहरा है। पाकिस्तान की सेना अपने इस मोहरा को कभी खोना नहीं चाहेगी। इमरान खान जैसा हां में हा मिलाने वाला राजनीतिज्ञ और कहां मिलेगा? पाकिस्तान की सेना यह सच्चाई जानती है। पाकिस्तान की सेना यह जानती है कि इमरान खान की ऐसा राजनीतिज्ञ हो सकता है जो सेना की सर्वोच्चता को बनाये रख सकता है। पाकिस्तान की सेना को यह विश्वास है कि जब तक उसके पास इमरान खान जैसा मोहरा है तब तक पंजाबी और सिंघी राजनीतिक अस्मिाएं भी नियंत्रित है। फजलूर रहमान जैसे नेताओं के आंदोलन से कोई खास प्रभाव नहीं पडने वाला है। जबकि पाकिस्तान की जनभावनाएं इमरान सरकार के खिलाफ खडी है। पाकिस्तान की जनभावनाएं यह मानती है कि कश्मीर के प्रश्न पर इमरान खान की विफलता घातक है, पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए आत्मघाती है, अगर इमरान खान की जगह कोई और प्रधानमंत्री होता तो फिर कश्मीर के प्रश्न पर दुनिया के अंदर में व्यापक समर्थन हासिल कर सकता था। इसके अलावा भी इमरान खान के अलोकप्रिय होने के कारण है। सबसे बडी बात आतंकवादियों और मजहबी जमात का नियंत्रण है। आतंकवादियों और मजहबी जमात के नियंत्रण की कोई कोशिश ही नहीं हुई। सेना अपने पाले हुए आतंकवादियों और मजहबी जमात को समाप्त नहीं होने देना चाहती है। इस कारण पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी रूकती नहीं है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इमरान खान की अविश्वसनीयता जारी रहेगी। 
  अर्थव्यवस्था गत विकास के लिए और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इमरान सरकार की विश्वसनीयता के लिए शांति और हिंसा से मुक्ति जरूरी है। ऐसी राजनीतिक तकरार और बाधाओं से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से मजबूत नहीं होगी, दुनिया के निवेशक भी पाकिस्तान में निवेश करने की रूचि नहीं रखेंगे। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कर्ज देने वाले देश और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं भी निवेश करने या फिर कर्ज देने से डरेंगे। आतंकवादी संगठनों के भी मजबूत होने के खतरे हैं। इसलिए कि फजलूर रहमान के आंदोलन में आतंकवादी संगठन और मजहबी कट्टरपंथी लोग ही शामिल हैं, अगर ऐसे लोग राजनीतिक समर्थन हासिल करते हैं तो आतंकवाद और हिंसा की कसौटी पर पाकिस्तान की स्थिति और भी विस्फोटक होगी। इमरान खान ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की सेना को राजनीतिक सर्वानूमति बना कर चलने की जरूरत है।

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